घुसखोरी का अलग नाम है कमीशन

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)। पिछले दिनों इलाहाबाद बैंक के कार्यों को लेकर हमारे पास न जाने कितने ही कंप्लेन आएं हैं, जिसे हम सचेत हैं और अपने अखबार पर हर हफ्ते बैंक के ग्राहकों से संबंधित इसकी कहानियां प्रकाशित कर रहे हैं। ऐसे में पिछले हफ्ते हमने आपको बताया था कि कैसे बैंक के कर्मचारी और उच्च पदों पर बैठे अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और बैंक के ग्राहकों को इससे कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके बाद हमने आपको ये भी बताया कि कैसे निमयों की धज्जियां उड़ाते हुए बैंक के कर्मचारी और अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग करते हैं एवं अपने ही बैंक के ग्राहकों को परेशान करते हैं। आज के हमारे अंक में भी हम बैंक के कर्मचारियां द्वारा की जा रही एक ऐसी ही घिनौनी हरकत के बारे बताने जा रहे हैं।

दरअसल बात ऐसी है कि बैंक के ही एक ग्राहक, जो कि एक विज्ञापन कंपनी के भी मालिक हैं, पिछले दिनों बैंक के अधिकारियों द्वारा अपने साथ हुए दुव्र्यवहार की घटना के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने हमारे अखबार को बताया कि वे सरफासी नोटिस के विज्ञापन के सिलसिले में बैंक के मुख्य प्रबंधक श्रीवास्तव से मिले, जिसके बाद श्रीवास्तव ने उन्हें बैंक के डीजीएम अर्मगम से मिलवाया। उन्होंने डीजीएम को बातों ही बातों में बताया कि हमारे विज्ञापन एजेंसी में इस विज्ञापन को छापने का रेट 52 रुपए प्रति स्क्वायर सेंटीमीटर है। इलाहाबाद बैंक के डीजीएम ने इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया न देते हुए बैंक के अधिकारी पेनुगोंडा रेड्डी से बातचीत की। उन्होंने पेनुगोंडा रेड्डी को बताया कि इस विज्ञापन कंपनी का रेट काफी कम हैं, एक बार देख लो। विज्ञापन कंपनी के मालिक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह कोई पहली बार नहीं है कि बैंक के साथ विज्ञापन का रिश्ता जोडऩे चले थे, बल्कि इससे पहले भी कई बार अलग अलग शुल्कों पर विज्ञापनों का प्रकाशन तय किया गया था। हालांकि 52 रुपए प्रति स्क्वायर सेंटीमीटर का रेट सुनकर बैंक के डीजीएम अर्मगम काफी नाखुश दिखे। इलाहाबाद बैंक के डीजीएम अर्मगम ने पेनुगोंडा रेड्डी से अपनी बात विज्ञापन कंपनी के मालिक तक भिजवाया जिसके बाद पेनुगोंडा रेड्डी ने पूछा कि आपने 52 रुपए का रेट तय किया है तो आप इसमें से डीजीएम को कितना कमीशन देंगे। इस पर उस खाताधारक ने कहा कि इस रेट पर हम कुछ भी कमीशन नहीं दे सकते। साथ ही उन्होंने पेनुगोंडा रेड्डी को यह भी बताया कि मैं तो बैंक का पुराना ग्राहक हूं और मैंने बहुत कम मार्जीन पर रेट तय किया है, इस पर कमीशन देना मेरे लिए संभव नहीं होगा। इस पर पेनुगोंडा रेड्डी ने साफ तौर पर कहा कि जब तक आप डीजीएम को कमीशन नहीं देंगे तब तक आपको कोई विज्ञापन नहीं मिलेगा। इस पर जब विज्ञापन कंपनी के मालिक व बैंक के ग्राहक ने फिर से डीजीएम अर्मगम से मुलाकात की और उन्हें यह बताया कि पेनुगोंडा रेड्डी ने मुझे ये कहा, तो डीजीएम अर्मगम ने अपनी लाज बचाते हुए पेनुगोंडा रेड्डी को बुलाकर कहा कि देख लो क्या करना है। इसके बाद जैसे ही ग्राहक और रेड्डी बाहर आए तो रेड्डी ने उन्हें बताया कि देखिए, अगर आपने अर्मगम को कोई कमीशन नहीं दिया तो ऐसे में आपको केवल एक या दो विज्ञापन प्रकाशन की जिम्मेदारी मिल सकती है, इसके अतिरिक्त हम कुछ भी नहीं कर सकते। क्योंकि एक नियमित एजेन्ट ने डीजीएम को कमीशन देने का वादा किया है। इस पूरे घटना के बाद जब विज्ञापन कंपनी के मालिक ने डीजीएम और श्रीवास्तव से बात करनी चाही तो डीजीएम अर्मगम ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया। वहीं श्रीवास्तव ने उन्हें इशारो से समझाया कि जब तक इस पर कमीशन तय नहीं हो जाता विज्ञापन मिलना मुश्किल है। इलाहाबाद बैंक में जब वे रेड्डी से दौबारा मिले तो उन्होंने बताया कि रेट आपने कितना कम रखा है, इससे बैंक को क्या फर्क पड़ता है। यह तो बैंक का पैसा है। इसीलिए आप 52 रुपए की 55 रुपए ही कर दीजिए। क्योंकि आप कमीशन देंगे तो ही बिजनेस मिलेगा वरना नहीं मिलेगा। इस पर ग्राहक ने कहा कि मुझे बिजनेस नहीं मिले तो भी कोई अफसोस नहीं है, लेकिन फिर भी मैं कोई कमीशन नहीं दूंगा और न ही अपने हाथों से किसी प्रकार से भ्रष्टाचार को बढ़ावा दूंगा। सीधे तौर पर मांगे गए इस कमीशन को आप क्या कहेंगे। यह भ्रष्टाचार का ही एक और रूप है, जिससे शायद आज भी कई लोग अंजान है। मालूम हो कि बैंक के साथ इस विज्ञापन कंपनी के मालिक का रिश्ता काफी पुराना है। वे इलाहाबाद बैंक के साथ वर्ष 2010 से 2013 तक सक्रिय रूप से विज्ञापन से जुड़े रहें और बैंक को यह सुविधा मुहैय्या कराते रहे। उन्होंने हमें बताया कि आमतौर पर जब बैंक यह नोटिस विज्ञापन एजेंसियों के माध्यम से प्रकाशित करते हैं तो इसका रेट 55 रुपए प्रति स्क्वायर सेंटीमीटर के साथ ही जीएसटी को भी शामिल किया जाता है। अमुमन समय पर ये कर्नाटक में एक अंग्रेजी और एक कन्नड़ पेपर में प्रकाशित किया जाता है। अब तक तो आपको यह पता चल ही गया होगा कि कैसे धीरे - धीरे सरकारी बैंकों की हालत खास्ता हुई है।  ये कोई एक दिन की बात नहीं है। घुसखोरी, भ्रष्टाचार दिनों दिन बैंक में हुई है जिसकी वजह से आज कई सरकारी राष्ट्रीय बैंकों का विलय किया जा रहा है। यह इलाहाबाद बैंक ही हैं जहां कर्मचारी पद पर बैठे लोगों से लेकर उच्च पदों पर पदासीन अधिकारियों तक भ्रष्टाचार और घुसखोरी का मामला जारी है। फर्क केवल इतना है कि अच्छे शब्दों में ही इस घुसखोरी को कमीशन का नाम देकर चलाया जाता है। इस घटना के बाद जब उस ग्राहक से हमारे सहयोगी अखबार समाचार परिवर्तन ने बात की तो उन्होंने यह बताया कि बैंक के कर्मचारी और अधिकारी हर छोटी बड़ी बात पर कमीशन मांगते हैं।

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