राजस्थान में छिड़ी उठापटक की राजनीति

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

राजनीति में उठापटक आम बात है, लेकिन कोरोना महामारी के बीच अगर नेता राजनीति ही करने में व्यस्त है तो क्या कहें। पहले गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्यप्रदेश और अब राजस्थान। एक एक कर सभी राज्यों में दल बदल और उठापटक की राजनीति शीर्ष पर है। लेकिन आज हम बात राजस्थान में चल रहे सियासी गहमा गहमी की करेंगे। राजस्थान सरकार के डगमगाने का असल कारण उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट की नाराजगी है। इन दोनों नेताओं के बीच की तकरार सामने आने के बाद कांग्रेस ने अपने कमजोर नेतृत्व का परिचय देते हुए सचिन पायलट को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब सवाल यह उठता है कि सचिन पायलट जैसे युवा नेता इस राजनीति का पलटवार कैसे करेंगे। अटकलें तो ये भी लगाई जा रही है कि राजस्थान भी मध्य प्रदेश जैसे दिन देखने को बाध्य होगा? इसका कारण यह है कि उसने इस तथ्य से अवगत होने के बाद भी समय पर हस्तक्षेप करने की कोई कोशिश नहीं कि सचिन पायलट को हाशिये पर किया जा रहा है। सचिन पायलट को केवल किनारे ही नहीं किया गया, बल्कि उन्हें अपमानित भी किया गया। आखिर यह उनका अपमान नहीं तो क्या है कि राजस्थान पुलिस ने कांग्रेसी विधायकों की खरीद-फरोख्त के मामले में उन्हें नोटिस थमा दिया? यह नोटिस सचिन पायलट के प्रति अशोक गहलोत के गहरे अविश्वास को ही प्रकट करता है।

देश भर में कांग्रेस की स्थिति देखें तो दो बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं। एक, जिन राज्यों में कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से बाहर है, वहां उसकी स्थिति बहुत बुरी है, और दो, जिन राज्यों में वह किसी तरह सत्ता में आ गई है, वहां उसकी स्थिति और ज्यादा बुरी है। इन राज्यों में अपनी सरकार बचाना और अपने लोगों को जोड़कर रखना उसके लिए लोहे के चने चबाने जैसा साबित हो रहा है।

कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे कई राज्यों में राज्य सभा चुनावों का समीकरण बिगाड़ चुके हैं। इस क्रम में दलबदल विरोधी कानून निरर्थक सिद्ध हुआ है सो अलग। मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का गिरना एक ऐसे संकट की शुरुआत है, जिसका कोई तोड़ कांग्रेस अभी के माहौल में नहीं खोज पा रही। याद रहे, कमलनाथ ने अपने बेटे को लोकसभा चुनाव जीतने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलवा कर यह संकेत दे दिया था कि उन पर ज्यादा दबाव आया तो अपनी आखिरी पारी वे बीजेपी के साथ खेलने में संकोच नहीं करेंगे।

बहरहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि अब राजस्थान की राजनीति में क्या मोड़ आता है। कांग्रेस के युवा चेहरे सचिन पायलट के पार्टी से बाहर होने के बाद उनका अगला कदम क्या होगा। क्या वह कांग्रेस के अंदर अपने प्रेशर ग्रुप यानी अपने हम उम्र नौजवान नेताओं के जरिए कांग्रेस में सम्मानजनक जगह के लिए बारगेन करेंगे। अगर उनके पास विधायकों की संख्या हो जाती है तब वह अशोक गहलोत से अपमान का बदला ले सकते हैं, मगर उसके पहले अगर पार्टी व्हिप जारी करती है और वह और उनके विधायक इसका उल्लंघन करते हैं तो पार्टी की सदस्यता और विधायक के पद से हाथ धोना पड़ सकता है। सचिन पायलट के समक्ष एक खुला रास्ता और भी है कि वह अपने साथ गए विधायकों को समझाएं कि बीजेपी में उनके मान-सम्मान की रक्षा करेंगे और उनके साथ वह बीजेपी में चले जाएं, मगर इसमें संकट यह है कि बहुत सारे ऐसे लोग सचिन पायलट के साथ हैं जो बीजेपी में नहीं जाना चाहते हैं।

ग़ौर करने वाली बात यह है कि अन्य राज्यों की तरह अब राजस्थान में भी सियासी उठापटक के बीच सरकार के अस्तित्व पर तलवार लटक रही है। विधायक बागी हो गए तो सरकार का गिरना तय है।

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