राजस्थान की राजनीति पर प्रश्न चिह्न

Total Views : 514
Zoom In Zoom Out Read Later Print

बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

देश में राजनीतिक परिदृश्य का बदलना बेहद आम सी बात हो गई है। हालांकि आज कई ऐसे राजनैतिक संगठन हैं जो वर्षों से राजनीति तो कर रहे हैं लेकिन राजनीति के उसूलों को ताक पर रख कर। राजनीति की बात हो और राजस्थान में जो कुछ भी चल रहा है, उस पर बात न की जाए, ऐसा हो सकता है क्या? प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक ओर जहां घमासान मचा हुआ है तो वहीं दूसरी ओर राजस्थान की राजनीति पर बुद्धिजीवियों ने प्रश्न चिह्न लगा दिया है। राजस्थान में सत्ता की लड़ाई से ज्यादा जरूरी हो गया है स्वाभिमान की लड़ाई, जिसमें आमने सामने अलग अलग पार्टियों के नेता नहीं बल्कि एक ही पार्टी को दो प्रमुख नेता अपने सहयोगियों के साथ सीना ताने खड़े हैं। देखते ही देखते मामले ने ऐसा तुल लिया कि आखिरकार बात राजस्थान हाईकोर्ट तक पहुंच गई। बहरहाल, अब देखना है कि यह राजनीतिक हाई वोल्टेज ड्रामा अब और कौन सा मोड़ लेती है।

राजस्थान की राजनीतिक इतिहास

राजस्थान की राजनीति में दो दलों भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) का वर्चस्व है। राजस्थान में वर्तमान सरकार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की है। राजस्थान की राजनीति में मुख्य रूप से भारतीय स्टेट पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के क्रमशः दो राज्य सत्ताधारी भैरों सिंह शेखावत और मोहन लाल सुखाड़िया का वर्चस्व रहा है। सुखाड़िया ने राजस्थान में 17 वर्षों तक शासन किया और फरवरी 1982 में उनकी मृत्यु हो गई, जबकि स्वर्गीय शेखावत राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज में थे। पहले की राजनीति में कांग्रेस पार्टी का वर्चस्व था। मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनसंघ था, जिसके प्रमुख राजस्थान के सबसे लोकप्रिय नेता भैरों सिंह शेखावत थे और राजस्थान के पूर्व शासकों के नेतृत्व वाली स्वातंत्र्य पार्टी थी। कांग्रेस का शासन वर्ष 1962 तक अछूता था। लेकिन 1967 में, जयपुर की राजमाता गायत्री देवी के नेतृत्व में शेखावत और स्वातंत्र पार्टी के नेतृत्व में जनसंघ बहुमत के बिंदु पर पहुंच गया, लेकिन सरकार नहीं बना सका। 1972 में, 1971 के युद्ध में जीत के बाद कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल की। लेकिन आपातकाल की घोषणा के बाद, शेखावत बेहद लोकप्रिय हो गए, खासकर जब उन्हें गिरफ्तार करने के लिए मजबूर किया गया और हरियाणा की रोहतक जेल भेज दिया गया। जैसे ही आपातकाल हटा लिया गया, एक संयुक्त विपक्षी जनता पार्टी ने 200 सीटों में से 151 सीटों पर जीत हासिल करते हुए जोरदार जीत अपने नाम कर लिया। शेखावत मुख्यमंत्री बने। दिल्ली में सत्ता बहाल करने के बाद इंदिरा गांधी ने 1980 में सरकार को बर्खास्त कर दिया था। 1980 के चुनाव में, जनता पार्टी ने केंद्र में विभाजन कर कांग्रेस को राजस्थान में जीत दिलाई।

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी और 1985 में एक सहानुभूति लहर ने कांग्रेस को चुनावों में जाने दिया। लेकिन 1989 में, जिसे शेखावत लहर कहा जा सकता था, बीजेपी-जेडी गठबंधन ने लोकसभा की सभी 25 सीटें और विधानसभा की 200 में से 140 सीटें जीत लीं। शेखावत दूसरे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री बनें। यद्यपि जनता दल ने शेखावत सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया, लेकिन शेखावत ने जेडी से अलग हो जाने का फैसला लिया और मुख्यमंत्री के रूप में शासन करना जारी रखा। इस प्रकार मास्टर मैनिपुलेटर का खिताब अर्जित किया। अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद, शेखावत सरकार को पीएम नरसिम्हा राव द्वारा निलंबित कर दिया गया और राजस्थान में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। 1993 में चुनाव हुआ जिसमें जनता दल के साथ अपना गठबंधन टूटने के बाद भी उनकी पार्टी जीती। लेकिन तत्कालीन गवर्नर बाली राम भगत ने शेखावत को सरकार बनाने की अनुमति नहीं दी, लेकिन सरदार गुरजंट सिंह, रानी नरेंद्र कंवर, सुजान सिंह यादव, रोहिताश्व कुमार शर्मा कुमार अरुण सिंह, सुंदर लाल आदि जैसे निर्दलीय उम्मीदवारों के समर्थन के बाद शेखावत ने भारी दबाव बनाया, इस प्रकार विधानसभा की 101 सीटों के बहुमत को पार कर लिया। शेखावत तीसरे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री बनें। इस बार उन्होंने एक सफल तीसरा कार्यकाल पूरा किया। 

यह शायद राजस्थान के लिए एक हीरे के जैसा चरण था क्योंकि इससे चहुंमुखी विकास हुआ और राजस्थान ने भी तेजी से विकसित और सुंदर राज्य के रूप में विश्व में पहचान बनाई। शेखावत ने राजस्थान में हेरिटेज, डेजर्ट, रूरल, वाइल्डलाइफ टूरिज्म की शुरुआत की। 1998 के चुनावों में, प्याज के महंगाई के मुद्दे के कारण भाजपा भारी मतों से हार गई। अशोक गहलोत ने 5 साल की सरकार चलाई। लेकिन 1999 में विधानसभा चुनाव में जीत के 6 महीने बाद ही वह लोकसभा चुनाव हार गए। शेखावत 2002 में भारत के उपराष्ट्रपति बने, इसलिए उन्हें राजस्थान की राजनीति और भाजपा छोड़नी पड़ी। उन्होंने वसुंधरा राजे को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उन्होंने 2003 के चुनावों में भाजपा का नेतृत्व किया और उसे जीत दिलाई। वह 2003 - 2008 तक राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। नरपत सिंह राजवी स्वास्थ्य मंत्री थे, घनश्याम तिवारी खाद्य मंत्री थे, और गुलाब चंद कटारिया गृह मंत्री थे। भाजपा ने 2004 का लोकसभा चुनाव यहां से भी जीता। लेकिन दिसंबर 2008 में तालियां बजीं, जब भाजपा, राजे के कथित निरंकुश और निरंकुश शासन के भीतर का अंतर, और पुलिस ने गुर्जर-मीणा आंदोलन में ज्यादती की, जिससे राजे सरकार के विकास और विकास के तख्तों पर काबू पाया गया और कांग्रेस विजयी हुई। इस बीच कुछ निर्दलीय विधायक का समर्थन मिलता रहा। अशोक गहलोत ने राजस्थान के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। 2013 में भारतीय जनता पार्टी ने बहुत बड़े अंतर से जीत हासिल की। बीजेपी को 163 और कांग्रेस को 200 सीटों में से केवल 21 सीटें मिलीं। 

राजनीतिक विशेषज्ञों का आंकलन

राजनीतिक विशेषज्ञ प्रमोद भार्गव ने अपने एक ब्लॉग में लिखते हैं, राजस्थान का सत्ता-संग्राम राजस्थान उच्च न्यायालय के बाद राजभवन पहुंच गया। न्यायालय ने कांग्रेस के 19 बागी विधायकों की याचिका पर विधानसभा अध्यक्ष से यथास्थिति बनाए रखने को कहा है। साफ है, अब अध्यक्ष सीपी जोशी सचिन पायलट समेत 19 विधायकों को एकाएक अयोग्य घोषित नहीं कर पाएंगे? इसी घटनाक्रम के दौरान अशोक गहलोत अपने विधायकों को होटल से लेकर राजभवन पहुंचे और विधायक परिसर में ही धरने पर बैठ गए। गहलोत समेत विधायकों ने नारे लगाए और आरोप लगाया कि सरकार विधानसभा-सत्र बुलाना चाहती है लेकिन राज्यपाल कलराज मिश्र ऊपरी दबाव के चलते सत्र बुलाने की अनुमति नहीं दे रहे हैं। हालांकि मुख्यमंत्री और राज्यपाल की दो घंटे चली गुप्त चर्चा के बाद विधायक होटल चले गए। अलबत्ता विधानसभा अध्यक्ष की दलील है कि उच्च न्यायालय उन्हें बागी विधायकों को अयोग्यता की कार्यवाही से नहीं रोक सकता है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने नसीहत दी है कि लोकतंत्र में असहमति के स्वर को दबाया नहीं जा सकता है। असंतुष्ट विधायक भी जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, अतएव वे असहमति व्यक्त कर सकते हैं। अन्यथा लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा।

इसी बीच राजस्थान के सियासी दंगल में केंद्र सरकार ने भी दखल दे दिया। लिहाजा उच्च न्यायालय ने पायलट खेमे की ओर से केंद्र सरकार को पक्षकार बनाने के लिए दी गई अर्जी को स्वीकार कर लिया है। साफ है, अब केंद्र का पक्ष भी सुना जाएगा। केंद्र की ओर से महाअधिवक्ता आरडी रस्तोगी सरकार का पक्ष रखेंगे। बहरहाल यह मामला इतना पेचीदा हो गया है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सरकार बचाना मुश्किल होगा? लेकिन पायलट की गति भी 'दोई दीन से गए पांडे, हलुआ मिले न माड़े' कहावत को चरितार्थ हो सकती है क्योंकि राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं।

दरअसल मुख्यमंत्री गहलोत का यह बयान उन्हीं के लिए उल्टा पड़ सकता है कि यदि राजस्थान की जनता राजभवन का घेराव करती है तो मेरी कोई जिम्मेवारी नहीं होगी। यह बयान इसलिए बेबुनियाद है, क्योंकि अब तक गहलोत स्वयं मुख्यमंत्री हैं और कानून व्यवस्था की सीधे-सीधे जिम्मेदारी उन्हीं के हाथ है, इसलिए वे यदि यह कहते हैं कि वे सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं ले सकते तो यह कहने से पहले उन्हें राज्यपाल को त्यागपत्र सौंप देना चाहिए था। शायद इसीलिए राज्यपाल ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा भी है यदि राज्य सरकार राज्यपाल की सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं ले सकती है तो यह सवाल उठता है कि ऐसे राज्य में कानून-व्यवस्था की क्या स्थिति होगी। यही नहीं राज्यपाल कलराज मिश्र ने बाकायदा मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कहा, इससे पहले कि मैं विधानसभा सत्र बुलाए जाने के संबंध में संविधान विशेषज्ञों से चर्चा करता, आपने सार्वजनिक रूप से कह दिया कि यदि राजभवन का घेराव होता है तो यह आपकी जिम्मेदारी नहीं होगी। यदि आप और आपका गृह मंत्रालय राज्यपाल की सुरक्षा नहीं कर सकता तो राज्य में कानून व्यवस्था का क्या हश्र होगा? मैंने कभी किसी मुख्यमंत्री का ऐसा बयान नहीं सुना। यह गलत प्रवृत्ति की शुरुआत है। जहां विधायक राजभवन के भीतर विरोध प्रदर्शन कर रहे है।' साफ है, मुख्यमंत्री के बयान ने इस मामले को और पेचीदा बना दिया है।

अशोक गहलोत की मुश्किलें आगे और भी बढ़ती दिखाई दे रही है। दरअसल गहलोत ने बहुजन समाज पार्टी के सभी छह विधायकों का कांग्रेस में विलय करा लिया था, विलय का यह मामला भी उच्च न्यायालय पहुंच गया है। भाजपा विधायक दिलावर ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर इन विधायकों के कांग्रेस में विलय पर सवाल उठाए हैं। इस याचिका पर फिलहाल सुनवाई होना शेष है। दिलावर ने इसी सिलसिले में विधानसभा अध्यक्ष को भी एक याचिका दायर की है। उल्लेखनीय है कि ये सभी विधायक सितंबर 2019 में बसपा छोड़ कांग्रेस में विलय हो गए थे। इस घटना को बीते एक साल बाद ये याचिकाएं दायर की गई हैं। इससे तय होता है कि अशोक गहलोत को चारों तरफ से घेरा जा रहा है।

क्या पायलट ने लिया सिंधिया से प्रेरणा

ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि सचिन पायलट ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की प्रेरणा से गहलोत को पटकने के घटनाक्रम को अंजाम दिया हुआ है। लेकिन सिंधिया के साथ सुविधा यह रही कि वे अपने 22 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ने की घोषणा के साथ इस्तीफे भी दे चुके थे। इसलिए उन्हें राज्यसभा सदस्य बना देने से लेकर मध्य-प्रदेश की कमलनाथ सरकार को पटकनी देने का बीड़ा शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर और नरोत्तम मिश्रा ने उठा लिया था। इस घटना को अंजाम तक पहुंचाने में सहयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी कर रहे थे। इसलिए कमलनाथ सरकार को बहुमत के बावजूद गिराना आसान हो गया और इसके प्रमुख सूत्रधार शिवराज सिंह मुख्यमंत्री भी बन गए। कालांतर में सिंधिया को भी केंद्रीय मंत्री की शपथ दिला दी जाएगी।

इस परिप्रेक्ष्य में सचिन दुविधा में रहे। उन्होंने अभी तक स्पष्ट नहीं किया है कि वे अपने 19 विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो भी रहे हैं अथवा नहीं? यदि सचिन इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो भी जाते हैं तो उन्हें कोई उपलब्धि मिलना मुश्किल है? दरअसल उनके पास इतने विधायक नहीं है कि वे भाजपा के 72 विधायकों के साथ राजस्थान के मुख्यमंत्री बन जाएं? इसीलिए गहलोत सचिन को तेजाबी शब्दवाणों से कोसते हुए निकम्मा और नाकारा तक कह रहे हैं। ऐसा इसलिए भी कहा गया है कि वे सरकार में उप-मुख्यमंत्री और राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष रहते हुए सरकार गिराने में निर्लज्जता से जुटे हैं। जबकि सिंधिया ने बगावत का रुख इसलिए किया क्योंकि उन्हें चाहने के बावजूद न तो प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह तैयार थे और न ही उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाए जाने की गारंटी दी जा रही थी। इस अनिश्चितता से उबरने के लिए उन्होंने अपने निष्ठावान अनुयायी विधायकों के साथ भाजपा का दामन थाम लेने में ही राजनैतिक भविष्य की गारंटी समझी और सफलता भी प्राप्त कर ली।

क्यों मौन धारण किया है वसुंधरा राजे सिंधिया ने

राजनीतिक विशेषज्ञ प्रमोद भार्गव लिखते हैं, राजस्थान में इतनी बड़ी राजनीतिक उठा-पटक चल रही है लेकिन यहां की पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा की कद्दावर नेत्री वसुंधरा राजे सिंधिया अब तक मौन हैं। सभी जानते हैं कि वे भाजपा आलाकमान की आंख की किरकिरी बनी हुई हैं। जबकि भाजपा के सहयोगी रालोपा के सांसद हनुमान बेनीवाल ने राजे पर अशोक गहलोत सरकार को बचाने में सहयोग देने का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी है। बावजूद भाजपा के किसी भी नेता ने बेनीवाल की लानत-मलानत नहीं की। अलबत्ता वसुंधरा राजे ने भी कांग्रेस की दबे स्वर में आलोचना जरूर की, पर उनको लेकर गहलोत सरकार बचाने की जो शांकाएं की जा रही हैं, उस सिलसिले में कोई सफाई नहीं दी। दरअसल राजे गहलोत सरकार गिराने के खेल से इसलिए दूर बनी हुई हैं क्योंकि वे भलि-भांति जानती हैं कि यदि कांग्रेस सरकार गिरती भी है तो केंद्रीय नेतृत्व उन्हें मुख्यमंत्री बना देने का अवसर नहीं देगा। इस पद पर अलाकमान के पसंदीदा केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत बिठाए जा सकते हैं?

दरअसल वसुंधरा की आलाकमान अर्थात नरेंद्र मोदी से आरंभ से ही नहीं पटी। तमाम कोशिशों के बावजूद वसुंधरा लगातार चौथी बार धौलपुर लोकसभा सीट से चुनाव जीते अपने बेटे दुष्यंत को केंद्र सरकार का हिस्सा नहीं बना पाई हैं। उनके भतीजे ज्योतिरादित्य के भाजपा में आने से उनकी बची-खुची उम्मीदों पर भी पानी फिर गया है। ऐसे में गहलोत सरकार गिरी तो उन्हें भाजपा के 72 विधायकों पर भी पकड़ मजबूत बनाए रखना चुनौती साबित होगी? गोया, गहलोत सरकार गिर भी जाती है तो सचिन पायलट का मुख्यमंत्री बनना तो मुश्किल होगा ही वसुंधरा भी कोई गुल खिला दें, ऐसा लगता नहीं है? ऐसे में अंततः राजस्थान में मध्यावधि चुनाव की ज्यादा उम्मीद लगती है।


See More

Latest Photos