कब होगी साधु संतों की हत्या पर कार्रवाई

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

देश में अपराधों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं लेता। ये किसी एक विशेष राज्य की बात नहीं है बल्कि हर राज्य की बात है। वारदातों की खबरें कभी उत्तर प्रदेश से आती हैं, तो कभी तमिलनाडु से, कभी पश्चिम बंगाल से तो कभी राजस्थान से। हत्या, रेप जैसे मामलों को अब भी गंभीरता से नहीं लिया जाता। वारदात होती है, कुछ दिनों तक खबरों में और मीडिया में छाया रहता है उसके बाद सब खत्म। लोग बड़े ही आसानी से भूल जाते हैं। हालांकि ऐसी घटनाओं को अक्सर जिंदा नेताओं द्वारा रखा जाता है, ताकि समय आने पर उसका भरपूर राजनीति लाभ उठाया जा सके। ऐसे ही एक घटना बीते दिनों प्रकाश में आई जब राजस्थान के एक मंदिर के पूजारी को जमीन विवाद के मामूली सी झड़प के बाद पेट्रोल डाल कर जिंदा जला दिया गया। यह घटना कोई नई नहीं है। कुछ समय पहले महाराष्ट्र के पालघर में भी दो साधुओं को अपहरण के शक के आधार पर भीड़ द्वारा पीट पीट कर मार दिया गया। इतना ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में भी जहां के मुख्यमंत्री खुद भी साधु हैं, वहां भी ऐसी वारदातें थमने का नाम नहीं ले रही है। आखिर इन घटनाओं का अंत क्या है। क्यों अक्सर राजनीति करने बाद इन्हें दवा दिया जाता है। क्यों देश में साधु-संतों की हत्या के मामलों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। क्यों हत्या के आरोपियों पर कार्रवाई नहीं की जाती। इन सभी प्रश्न की जवाबदेही की जिम्मेदारी केवल राज्य सरकार की ही नहीं है बल्कि केंद्र सरकार की भी है। केंद्र सरकार चाहे तो कठोर कानून के बल पर इन्हें रोक सकती है, लेकिन इससे राजनीतिक लाभ तो नहीं मिलेगा, शायद इसीलिए ऐसी घटनाओं को दवा दिया जाता है। 

पक्ष-विपक्ष आमने सामने

वरीष्ठ लेखक सियाराम पांडेय 'शांत' लिखते हैं, साधु-संतों की हत्या पर पक्ष-विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। साधु-संतों पर होने वाले जानलेवा हमलों से संत-समाज भी नाराज है। हमले एक ही राज्य में हो रहे हों, ऐसा भी नहीं है लेकिन लोग अपने-अपने चश्मे से इसे देख रहे हैं। हाथरस की घटना पर वहां जाने की विपक्ष में होड़ लगी थी। लेकिन राजस्थान जाने में किसी विपक्षी दलों की कोई रुचि नहीं थी जहां दो बहनों ओर एक महिला के साथ के साथ बलात्कार की घटना की वीभत्स घटना हुई। वहीं एक पुजारी की बर्बरता से जलाकर हत्या कर दी गई लेकिन वहां भाजपा को छोड़कर शायद ही कोई विपक्षी दल मुखर हुआ है। यह विरोध की लामबंदी है या लामबंदों का विरोध। बलात्कार और हत्या जैसे मामले में इस देश का नेतृवर्ग जबतक अपना चुनावी लाभ तलाशेगा, इस तरह की घटनाओं को रोक पाना बेहद मुश्किल होगा।

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के इटियाथोक इलाके के तिर्रे मनोरमा के श्रीराम जानकी मंदिर के पुजारी सम्राट दास पर जानलेवा हमले को लेकर राजनीतिक पारा चढ़ गया है। विपक्ष ने योगी सरकार पर सीधे तौर पर निशाना साधा है। कांग्रेस ने जहां भूमाफियाओं के साथ सरकार की मिलीभगत को इस घटना के लिए जिम्मेदार ठहराया है। वहीं समाजवादी पार्टी का कहना है कि यूपी में लगातार साधु- संतों और पुजारियों पर हमले हो रहे हैं। पुजारियों पर हमले हो रहे हैं लेकिन सरकार चुप है। कांग्रेस ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि विगत दो साल में यूपी में साधु-संतों पर 20 हमले हुए हैं। कांग्रेस का आरोप है कि कुछ हत्याओं को पुलिस आत्महत्या बताकर कन्नी काट लेती है। साधु-संतों और पुजारियों के हमलों पर राजनीति करने वाले सपा और कांग्रेस को 1990 में सपा राज में अयोध्या में कारसेवकों पर हुई गोलाबारी तो याद ही होगी। इसमें कारसेवकों के साथ कितने साधु-संत हताहत हुए होंगे, इसका कुछ अंदाज तो उसे होगा ही।


देश की संस्कृति को बचाने में सहायक होते हैं साधु-संत

अच्छा होता कि उत्तर प्रदेश समेत सभी राज्यों की सरकारें इस बावत मंथन करतीं और साधु-संतों, पुजारियों, सेवादारों आदि की सुरक्षा के समुचित प्रयास करती। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को इतना तो समझना ही होगा कि साधु सपना देखकर गड़ा धन निकालने की राय ही नहीं देते वे समाज को सही राह भी दिखाते हैं। उन्हें संयमित जीवन जीने की शिक्षा भी देते हैं। साधु-संत इस देश की संस्कृति को बचाने में भी सहायक हैं। कई वर्षों पहले जब सामान्य शिक्षा की जरूरत होती तो वो साधु संत ही थे जिन्होंने ज्ञान की ज्योत जलाकर समाज को शिक्षित बनाया और सही राह दिखाया। हालांकि यह भी सच है कि आज समाज में कई बहरुपयों ने भी कब्जा किया हुआ है, जो खुद को साधु संत और परमात्मा साबित कर चुके होते हैं। हमें ऐसे लोगों से भी सावधान रहने की जरूरत है। 

साधुओं की हत्या पर राजनीतिक लाभ

काश, राजनीतिक दल सतही विरोध की राजनीति की बजाय साधु-संतों, पुजारियों और सेवादारों की सुरक्षा की कोई व्यापक रणनीति बनाते। गोंडा में पुजारी सम्राटदास पर हमले के पीछे 120 बीघे जमीन का विवाद है। भूमाफिया उसपर कब्जा चाहता है। इस वजह से इस मंदिर में पहले भी भूमाफिया के हमले हुए हैं। यहां पुलिस सुरक्षा भी दी गई थी। अब पुलिस की जगह यहां होमगार्ड सुरक्षा कर रहे हैं। हमले के मूल में कहीं सेक्योरिटी हासिल करने की रणनीति तो नहीं है। विचार तो इस बिंदु पर भी किया जाना चाहिए। एक ओर तो अपराधियों के मानमर्दन की बात हो रही है, दूसरी ओर अपराधियों की बढ़ती सक्रियता बेहद चिंताजनक है। सरकार को इस ओर भी ध्यान देना होगा।

हालांकि सच यह भी है कि ऐसी घटनाओं को राजनीतिक रूप देकर नेताओं द्वारा इसे राजनीतिक लाभ साधा जाता है। इसके पीछे उनकी मंशा साधु संतों को न्याय दिलाने की तो कतई नहीं होती। देखिए, बिहार चुनाव नजदीक है ऐसे में पहले सुशांत सिंह, फिर ड्रग्स और बॉलीवुड, फिर हाथरस और फिर अब पूजारी की हत्या। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां पूरी कर ली है और राजनीतिक रूप रेखा तैयार की जा चुकी है। 

कब-कब देश में हुई साधुओं की हत्या

1966 के गौरक्षा आंदोलन में इंदिरा गांधी द्वारा गौरक्षकों पर गोली चलवाने की घटना की स्मृति तो होगी ही। उन्हें यह बताने में शायद परेशानी होगी कि इस गोलीकांड में कितने गौरक्षक और साधु-संत हताहत हुए होंगे लेकिन भारत का आम जनमानस जानता है कि यह संख्या हजारों में थी। साधु-संतों के प्रति कांग्रेस की अहिष्णुता देखनी हो तो नसबंदी के दौर को उसे जरूर याद करना चाहिए जब सरकार को नसबंदी का आंकड़ा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए साधु-संतों और फकीरों तक की नसबंदी कर दी गई थी।

विपक्ष को वर्ष 2000 में त्रिपुरा में स्वामी शांतिकाली जी महाराज की हत्या का भी संज्ञान लेना चाहिए जो एक ईसाई उग्रवादी संगठन नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा ने की थी। पालघर में दो और नांदेड़ में एक साधु की हत्या के बाद साधु-संतों की नाराजगी से यह देश अपरिचित नहीं है। राजस्थान के करौली में बहुत दिन नहीं हुए जब एक पुजारी की पेट्रोल छिड़ककर हत्या कर दी गई। मायावती ठीक कह रही हैं कि जंगलराज तो कांग्रेस शासित राज्यों में भी है लेकिन उसके नेताओं को अपने राज्यों में हो रहे अपराध शायद दिखते नहीं। इसे कहते हैं सुविधा का संतुलन जिसमें चित-पट दोनों ही अपना दिखता है।

23 अगस्त 2008 में उड़ीसा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके चार शिष्यों की हत्या की गई थी। उस दौरान इसके पीछे ईसाई मिशनरियों और माओवादियों का कनेक्शन सामने आया था। बुलंदशहर और बागपत में संतों की हत्याएं हृदयविदारक हैं, इस सिलसिले को अविलंब खत्म होना चाहिए। अगस्त 2018 में मध्य प्रदेश में 10 दिनों में 6 साधु, 1 पुजारी और 3 सेवादारों की हत्या कर दी गई थी। 13 अगस्त, 2018 को अलीगढ़ के एक मंदिर में 75 वर्षीय साधु व उनके साथी की हत्या कर दी गई थी। 16 अगस्त को ओरैया के मंदिर में तीन साधुओं की हत्या कर दी गई थी। 19 अगस्त को हरियाणा के करनाल स्थित एक मंदिर में मंदिर में 1 पुजारी, 1 साधु व 2 सेवादारों की हत्या और हत्या की गई थी। 20 अगस्त, 2018 को प्रयाग में एक साधु की हत्या की गई थी।

सवाल यह है कि साधु-संत अराजक तत्वों और बदमाशों के टारगेट पर क्यों हैं। राजस्थान के करौली में एक पुजारी की निर्मम हत्या के बाद पूरे देश में बहस छिड़ गई है कि क्या हिंदुस्तान में साधु-संत सुरक्षित नहीं हैं? तमिलनाडु के प्रसिद्ध पंडित मुसनीश्वर मंदिर के एक पुजारी की अज्ञात हमलावरों ने मंदिर परिसर में घुसकर डंडों और अन्य हथियारों से पीट-पीटकर बेहद क्रूरता से हत्या कर दी। पुलिस ने बताया है कि मृतक पुजारी जी. मुथुराजा था जो अंधराकोट्टम हैमलेट का रहने वाला था।

गैर भाजपा राज्यों में बहस क्यों नहीं

प्रसिद्ध लेखक रवि पराशर लिखते हैं, ऐसा हमने पहले भी देखा है। 16 अप्रैल को महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं समेत तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी, वह भी पुलिस की मौजूदगी में। लेकिन कथित संवेदनशील सेक्युलर लोगों के मुंह से इसके विरोध में एक बोल तक नहीं फूटा। क्या महज इसलिए कि महाराष्ट्र में ग़ैर-भारतीय जनता पार्टी सरकार है? देश भर में हिंसक वारदात के कथित विरोध का पैटर्न अगर देखें, तो इसका साफ़ उत्तर यही मिलता है कि बीजेपी शासित यूपी में अगर किसी कमजोर के साथ अपराध किया जाता है, तो ही सेक्युलर लोगों और संस्थाओं को उसमें मानवता के प्रति संगठित अपराध की दुर्गंध आती है। अन्यथा नहीं। ऐसे लोगों को इंसानी भावनाएं और खून का रंग भी राजनैतिक चश्मों से ही नज़र आता है। अक्सर ऐसा होने लगा है कि भाजपा की सरकार वाले राज्यों, ख़ासकर उत्तर प्रदेश में जब भी ऐसी कोई वारदात सामने आती है, तो देश की राजधानी के सीमावर्ती इलाक़ों में हंगामा खड़ा करने की कोशिशें की जाती हैं। जब वैसी ही वारदात किसी कांग्रेस शासित राज्य में होती है, तब वही लोग मुंह पर ताला लगा लेते हैं। हाथरस की वारदात में तो तथ्यों को भी तोड़-मरोड़ कर पेश करने तक की कोशिश की गई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में रेप की पुष्टि नहीं की गई थी, बावजूद इसके कुछ लोग रेप-रेप कह कर चिल्लाने-चीखने लगे। हालांकि लड़की को जानलेवा चोटें लगी थीं, लिहाजा उसकी मौत अस्पताल में हो गई। उस वारदात को लेकर पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों ने असंवेदनशील रवैया अपनाया था, ऐसा मीडिया रिपोर्ट्स देख कर लगा था। बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी ज़िले में पुलिस-प्रशासन से जुड़े किसी अधिकारी या कर्मचारी के ग़ैर-ज़िम्मेदार रवैये पर विरोध जताने के लिए आप पहले ही स्तर पर राज्य के मुख्यमंत्री या सरकार से इस्तीफा मांगेंगे? इस तरह तो किसी भी राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार दो-चार दिनों से ज्यादा समय तक टिक ही नहीं पाएगी। 

बहरहाल, हाथरस मामले की जांच अब केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई कर रही है, लिहाजा उस पर ज्यादा टिप्पणी करना अभी ठीक नहीं होगा। हैरत की बात तो यह है कि जब हाथरस की वारदात पर हंगामा खड़ा किया जा रहा था, तभी राजस्थान में भी रेप की वारदात को अंजाम दिया गया था, लेकिन यूपी की महिलाओं के मसीहा बन कर सड़कों पर उतरे लोगों को राजस्थान में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कोई चिंता नहीं थी। देश पर पांच दशक से ज्यादा शासन करने वाली कांग्रेस की महासचिव और यूपी की प्रभारी प्रियंका वाड्रा और उनके भाई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी तो हाथरस में पीड़ित लड़की के गांव तक पहुंचे और जमकर सियासत की। दोनों ने राजस्थान की पीड़ित महिलाओं के पक्ष में एक शब्द भी नहीं कहा। मानो राजस्थान में अगर किसी महिला के साथ रेप होता है, तो क्योंकि वहां कांग्रेस का शासन है, लिहाजा वह कोई गंभीर बात नहीं हो। राहुल और प्रियंका क्या ऐसा सोचते हैं कि आम लोगों को उनका दोहरा रवैया समझ में नहीं आता?

देश का कथित सेक्युलर फ्रेब्रिक पहले भी एकपक्षीय था, लेकिन तब उसमें तुष्टीकरण के लक्षण होते थे। अब जबसे पोल खुलने लगी है, तबसे वह फेब्रिक चीनी मांझे से भी ज्यादा खतरनाक साबित होता जा रहा है। लोकतंत्र के लिए यह बात अच्छा संकेत नहीं है। कथित सेक्युलर सोच निंदा और चुप्पी के दो खांचों में ही सिमट कर रह जाए, तो वैचारिक तौर पर ही परेशानी की बात है, लेकिन सामाजिक तौर पर बहुत दिक्कत की बात नहीं है। लेकिन जब कथित सेक्युलर लोग एकपक्षीय सोच के साथ सामाजिक शांति-सद्भाव और सौहार्द के माहौल में चिंगारियां भरने के लिए बाक़ायदा साज़िश रचें और उसे अमली जामा पहनाने की कोशिश अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जाने लगे, तो बहुत चिंता की बात है। सीएए के विरोध के नाम पर जिस तरह हमने दिल्ली में आग भड़काने के लिए गर्म किए गए अंगारों से असलियत की राख की परतें झड़ते देखीं और अब यूपी के हाथरस ज़िले में दलित लड़की के साथ हुई बर्बरता के मामले के बाद माहौल बिगाड़ने के लिए बाकायदा फंडिंग की साज़िश का रहस्योद्घाटन बहुत गंभीर मसला है।

ऐसे मामलों में क्योंकि भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े विचार परिवार पर ही हर बार निशाना साधा जाता है, लिहाज़ा यह उन्हीं की प्राथमिक जिम्मेदारी भी है कि तथ्यों को स्पष्ट रूप से लोगों के सामने रखें। जागरूकता का माहौल बनाए रखें। बहुत बार जवाब भी उसी अंदाज में देना चाहिए, जिस अंदाज में सवाल खड़े किए जाएं। यही वजह है कि राजस्थान के करौली में मंदिर के पुजारी को जलाकर मार डालने के मामले में केंद्र सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने राजस्थान की कांग्रेस सरकार को कटघरे में खड़ा करने में देर नहीं लगाई। उन्होंने राजधानी जयपुर में मीडिया के सामने राज्य की गहलोत सरकार पर तो गंभीर आरोप लगाए ही, साथ ही राहुल गांधी को भी नसीहत दी कि वे ऐसी वारदात की अनदेखी न करें। इससे पहले राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष सतीश पूनिया और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी ट्वीट कर करौली की वारदात के लिए गहलोत सरकार पर निशाना साधा है।

इस बीच राजस्थान के ही बाड़मेर में मई में नाबालिग लड़की के साथ हुए बलात्कार के आरोपित को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया जा सका है। पीड़ित नाबालिग लड़की ने राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष संगीता बेनीवाल से मिलकर इंसाफ़ की गुहार लगाई है। बेनीवाल ने वारदात के पांच महीने बाद भी आरोपित के खुले घूमने पर ऐतराज जताते हुए राज्य पुलिस से मामले की जानकारी मांगी है। इस मामले में जल्द ही गिरफ्तारी नहीं हुई, तो गहलोत सरकार और कांग्रेस को घेरने के लिए बीजेपी के हाथ एक और मुद्दा लग जाएगा।


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