कमजोर कौन : मुख्यमंत्री या पुलिस

Total Views : 185
Zoom In Zoom Out Read Later Print

बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

उत्तर प्रदेश, जो देश का सबसे बड़ा विधान सभा क्षेत्र है। वही उत्तर प्रदेश जहां की जनसंख्या घनत्व देश में सबसे अधिक है। हां हम बात उसी उत्तर प्रदेश की कर रहे हैं, जो इन दिनों देश में सबसे ज्यादा अपराध के लिए भी प्रसिद्ध होने लगा है। यूपी में राजनीतिक परपंच, सियासत का खेल, बाहुबलीयों का वर्चस्व आदि सब कुछ है, केवल कानून व्यवस्था लचर है। इन दिनों राज्य में लगभग हर जिले, हर शहर और हर पंचायत क्षेत्र से अपराध की घटनाएं सामने आ रही है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली राज्य सरकार कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने को लेकर चाहे जितनी भी कहानियां गढ़ लें, लेकिन सच्चाई ये है कि अपराध के ज्यादातर मामले पुलिस प्रशासन के आंखों के सामने हो रहे हैं, और प्रशासन ने इस पर चुप्पी साध रखी हैं। प्रदेश में सिलसिले वार लगातार कई महीनों से आपराधिक घटनाएं घट रही है। कभी रेप तो कभी हत्या, कभी लिंचिंग तो कभी चोरी-डकैती या फिर कभी दंगा या हिंसा भड़काना। ऐसे मामले आए दिन देखने और सुनने को मिलते हैं। लेकिन यहां बड़ा सवाल ये है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था को दुरुस्त न बनाए रख पाने के लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाना चाहिए। एक ओर राज्य सरकार है जो आपराधिक घटनाओं को गंभीरता से नहीं लेती, तो वहीं दूसरी ओर राज्य की पुलिस प्रशासन है जो आए दिन कानून व्यवस्था को लेकर काफी उदासीन है।  

क्या मुख्यमंत्री के कंट्रोल में कुछ भी नहीं 

प्रदेश सरकार का ये रोना कोई आज की नई बात नहीं है। पिछले कई वर्षों से राज्य में आपराधिक घटनाओं का सिलसिला जारी है। राज्य में कितनी ही सरकारें आई और कितनी ही सरकारें गई लेकिन अपराध से जुड़ी घटनाएं कभी नहीं थमी। अब बात करते हैं योगी आदित्यनाथ के सरकार की। यूं तो सत्ता में आने के पहले योगी आदित्यनाथ ने कई लंबे चौड़े वादें किए थे कि राज्य को अपराध मुक्त बनाया जाएगा, लेकिन बीतते समय के साथ मामलें में हो रही बढ़ोत्तरी कुछ और ही इशारा कर रही है। राजनीति से जुड़े विशेषज्ञ कहते हैं कि सीएम योगी दावा करते हैं कि यूपी में न्यूनतम अपराध हैं, सामान्यतः उत्तर प्रदेश में अपराध तीन वर्षों में न्यूनतम हैं। लॉ एंड ऑर्डर बेहतर स्थिति में है और आगे भी बेहतर स्थिति में रहेगी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने ये दावा पाँच अगस्त 2020 यानी उसी दिन किया जब प्रदेश के पश्चिमी इलाक़े में आठ साल की बच्ची की रेप की कोशिश की गई और जब बच्ची शोर मचाने लगी तो उसकी हत्या कर दी गई। जब देश भर का मीडिया अयोध्या में राम मंदिर के भूमिपूजन समारोह की कवरेज में व्यस्त था तो इससे लगभग 650 किलोमीटर की दूरी पर एक माता-पिता अपनी आठ साल की लापता बच्ची को खोज रहे थे लेकिन उन्हें अपनी बच्ची की लाश एक खेत में मिली। इससे चार दिन पहले यानी 31 जुलाई, 2020 को यूपी के मुजफ़्फ़रनगर में आठ साल की एक बच्ची का रेप किया गया और गला घोंटकर हत्या कर दी गई। इस बच्ची का शव भी गन्ने के खेत में फ़ेका हुआ मिला। ये बीते दो दिनों के भीतर हुई ये घटनाएं यूपी में न्यूनतम अपराध है के दावे की स्याह तस्वीर पेश करती हैं। ये वो घटनाएं हैं जो ख़बरों में आ आईं, संभव है कि कई ऐसे भी मामले हों जो मीडिया रिपोर्ट्स तक नहीं पहुंच सके हों। महिलाओं की सुरक्षा को अपनी वरीयता बताने वाले सीएम योगी न्यूज़ चैनलों के इंटरव्यू देते समय सूबे में न्यूनतम अपराध की बातें करते हैं और दूसरी ओर उन्हीं की सरकार विधानसभा में अलग आँकड़े पेश करती है। योगी सरकार ने समाजवादी पार्टी के एक विधायक नहीद हसन के सवाल के जवाब में बताया था कि 2016 के मुकाबले 2017 में हर एक सेगमेंट में महिलाओं के खिलाफ़ अपराध में बढ़त हुई है।

बंद पड़ती कई सुविधाएं

उत्तर प्रदेश में कई योजनाओं की शुरुआत तो कर दी जाती है, लेकिन कुछ समय के बाद उन्हें बिना किसी नोटिस के बंद भी कर दिया जाता है। ऐसी ही एक योजना है वीमेन हेल्पलाइन योजना। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आठ मार्च 2016 को एक महत्वकांक्षी प्रोजक्ट के तहत वीमेन हेल्पलाइन 181 की शुरुआत की थी। इसे पायलेट प्रोजेक्ट के तहत 11 ज़िलों में लॉन्च किया गया। इस हेल्पलाइन नंबर को चलाने की ज़िम्मेदारी मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टेंडिंग के तहत पांच साल तक के लिए एक प्राइवेट कंपनी जीवीके इमर्जेंसी मैनेजमेंट एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट को दिया गया।

इसके बाद मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और योगी मुख्यमंत्री बने। साल 2017 के एनसीआरबी के मुताबिक महिलाओं के खिलाफ़ अपराध के मामले में उत्तर प्रदेश 56011 केस के साथ नंबर एक पर पहुंच गया। इसे देखते हुए जून 2018 में योगी सरकार ने इस योजना को 11 ज़िलों बढ़ा कर 75 ज़िलों तक पहुंचाया।

लेकिन बीते फ़रवरी से राज्य के महिला एवं बाल विकास विभाग ने फंड रोक दिया। 11 महीनों से इस हेल्पलाइन के लिए काम कर रही 350 से ज़्यादा महिला कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला है। इस हेल्पलाइन में लखनऊ के हेडक्वार्टर में टेलिकउंसलर्स जो फ़ोन पर बातचीत के ज़रिए मदद मुहैया कराती थी, फील्ड काउंसलर और एक रेस्क्यू वैन हर ज़िले में रखी गई थी। जून में इस हेल्पलाइन नंबर को बंद कर दिया गया। 24 जुलाई, 2020 को योगी सरकार ने इस वीमेन हेल्पलाइन नंबर को पुलिस हेल्प लाइन नंबर 112 से जोड़ दिया है जिसका मतलब है कि अब जिस नंबर का इस्तेमाल पुलिस को इमर्जेंसी कॉल के लिए किया जाता है उसी को वीमेन हेल्पलाइन की तरह भी इस्तेमाल किया जाएगा। वेतन ना मिलने पर जब महिला कर्मचारियों ने भूख हड़ताल करने को कहा तो योगी सरकार ने जल्द से जल्द बकाया वेतन देने को कहा है हालांकि अब तक इन महिलाओं को वेतन नहीं मिला है। यानी महिलाओं के खिलाफ़ बढ़ते अपराध के बावजूद वीमेन हेल्पलाइन बंद कर दी गई।

प्रदेश में पुलिस से परेशान है जनता 

एक जमाना था जब पुलिस को लेकर जनता की सोच होती थी कि पुलिस जनता की रक्षा करती है। लेकिन हाल के घटनाओं को देखें तो ऐसा लगता है जैसे जनता अब अपराधियों से ज्यादा पुलिस से डरने लगी है। जब यूपी में एंटी रोमियो स्क्वाड की गस्ती शुरु हुई तो ऐसे कई मामले प्रकाश में आए। मनचलों से लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा करने की बीड़ा राज्य पुलिस ने उठाई थी, लेकिन बाद में पता चला पुलिस वाले ही जनता को परेशान करने लगे। 30 मार्च 2017 को ख़बर सामने आई जहां एंटी रोमियो गस्त पर निकली पुलिस ने रामपुर में एक भाई-बहन को परेशान किया और पुलिस थान ले आए। ये भाई-बहन गाँव से रामपुर शहर दवा लेने आए थे। जब दोनों ने ये साबित कर दिया की वह भाई-बहन हैं तो भी पुलिस पर छोड़ने के एवज में 5 हज़ार रुपए मांगने का आरोप है। एंटी रोमियो को लेकर ऐसी कई ख़बरें सामने आईं जहां उन्होंने सुरक्षा तो नहीं दी बल्कि मुश्किलें जरूर बढ़ाईं। जून 2019 में सूबे में अपराध के मामले बढ़ते मामलों को देखते हुए योगी सरकार ने राज्य की पुलिस को एंटी रोमियो दस्ता को दोबारा सक्रिय करने के आदेश दिए। एंटी रोमियो दस्ते की कार्रवाई के डेटा के मुताबिक़ प्रयागराज, आगरा, गोरखपुर, लखनऊ, बरेली, कानपुर सहित 10 ज़ोन में एंटी रोमियो दल ने कुल 7134 मामले दर्ज किए, 11222 गिरफ़्तारियां की गई। लेकिन आँकड़े कहते हैं कि इसका कोई बड़ा असर उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ़ बढ़ रहे अपराध को कम करने में नज़र नहीं आता।   

बीजेपी के लिए जंगलराज की परिभाषा !    

राजनीतिक विशेषज्ञ मृगांक शेखर लिखते हैं, उत्तर प्रदेश के बलिया के दुर्जनपुर गांव की घटना एसडीएम और पुलिस के सर्कल ऑफिसर सदल बल पहले से ही मौके पर मौजूद होते हैं। जो कुछ भी होता है वहां सबकी आंखों के सामने होता है। पहले गर्मागर्म बहस होती है। फिर बहस मारपीट में बदल जाती है। देखते ही देखते लाठी-डंडे के साथ ही पत्थरबाजी शुरू हो जाती है - और फिर एक शख्स गोली चला देता है। दूसरे पक्ष के एक व्यक्ति को गोली लगती है, जो अस्पताल ले जाते वक्त रास्ते में ही दम तोड़ देता है। फिर लोग हमलावर को घेर लेते हैं और तभी पुलिस भी सामने से आ धमकती है। लोग पीछे हट जाते हैं, ये सोच कर कि पुलिस गोली मारने वाले को पकड़ लेगी - लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं होता। बल्कि वो होता है जिसके बारे में शायद ही कोई कल्पना करता हो।

अचानक मालूम होता है कि पुलिस वहीं खड़ी है और हमलावर भाग जाता है। दूर खड़े कुछ लोग वीडियो भी बना रहे होते हैं और ऐसे ही एक वायरल वीडियो में पूरा नजारा नजर आता है। जिस व्यक्ति की हत्या हो जाती है उसके घर वालों का आरोप है कि पुलिस ने जानबूझ कर हमलावर को भगा दिया। आरोप है कि जब लोग लाठी डंडा लेकर हमलावर का पीछा कर रहे थे तो पुलिस ने जानबूझ कर उसे भगाने के लिए घेरा बना लिया था और मौका पाकर उसे भाग जाने दिया। पुलिस के मौके पर होने के बावजूद हत्या हो जाने और हत्यारे के पुलिस की पकड़ से भाग जाने को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पुलिस क्षेत्राधिकारी के साथ साथ एसडीएम को भी सस्पेंड कर देते हैं। पुलिस के डीआईजी मौके पर पहुंचते हैं और इलाके में डेरा डाल देते हैं। पुलिस धीरेंद्र प्रताप सिंह सहित आठ लोगों के खिलाफ नामजद और करीब दर्जन भर अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करती है। पुलिस की टीम जगह जगह दबिश डाल कर पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लेती है।

ये घटना तब हुई जब सरकारी कोटे की दो दुकानों के आवंटन के लिए पंचायत भवन पर बैठक बुलायी गयी थी। एसडीएम और सीओ के साथ साथ बीडीओ भी मौजूद थे। एहतियात के तौर पर पुलिस फोर्स को भी बुला लिया गया था। दुकानों के लिए कुछ सेल्फ-हेल्प ग्रुपों की तरफ से आवेदन किया गया था, लेकिन कुछ ऐसी बातें हुईं कि दो पक्षों में झगड़ा हो गया और अंत में एक हत्या भी। सवाल ये है कि कानून व्यवस्था को लेकर आखिर किन परिस्थितियों में जंगलराज की संज्ञा दी जाती है? भीड़ ने गोली मारने वाले को घेर लिया हो तो बेशक पुलिस को आगे बढ़ कर अपनी ड्यूटी निभानी चाहिये। निश्चित तौर पर पुलिस को किसी को कानून हाथ में लेने का मौका नहीं देना चाहिये. मॉब लिंचिंग भी अपराध ही होता है। तब क्या कहा जाएगा जब पुलिस भीड़ के आगे आकर आरोपी को पकड़ने और गिरफ्तार करने की जगह उसके भागने में मददगार बन जाये? 

जब मौके पर एसडीएम जैसा प्रशासनिक अधिकारी मौजूद हो और पुलिस टीम का अफसर क्षेत्राधिकारी मौजूद हो - तो क्या संभव है कि कुछ सिपाही और दारोगा किसी व्यक्ति को मौके से फरार हो जाने देंगे? जाहिर है अफसरों के हुक्म की ही तामील हुई होगी। पुलिसकर्मियों ने जो भी किया होगा, अपने अफसरों की मर्जी से ही किया होगा - कोई एनकाउंटर तो चल नहीं रहा था और वो भी कोई पेशेवर अपराधी या गुमनाम चेहरा तो था नहीं कि उसके लिए मौके से भागते वक्त कोई पहचान न पाया हो। आखिर बीजेपी के लिए बिहार और यूपी में जंगलराज की परिभाषा अलग अलग क्यों है?

आंकड़ों से जाने यूपी की कहानी

बीते दिनों विकास दुबे एंकाउंटर के बाद एक बार फिर उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े होने लगे। इस घटना के बाद भी आपराधिक वारदातों का सिलसिला चलता रहा। इस बीच राजनीति भी चरम पर रही राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ट्वीट कर अपराधियों और सरकार के बीच मिलीभगत होने का आरोप लगा दिया। वहीं, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी ट्वीट कर यूपी के क्राइम पर सवाल उठाए थे। हालांकि, राजनीतिक का पलड़ा अपराध की घटनाओं जितना भारी तो नहीं है लेकिन इन दोनों बातों में पुलिस की भूमिका पर अक्सर सवाल उठाते आए हैं। कई सरकारी एजेंसियों का डेटा भी इस ओर इशारा करता है कि यूपी में क्राइम देश में सबसे ज्यादा है। आइए जानते हैं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के डेटा के जरिए उत्तर प्रदेश में क्राइम का क्या स्तर है।

लगभग 11.5% अपराध यूपी में हुए : सबसे ताजा आंकड़े 2018 तक के मौजूद हैं। एनसीआरबी के डेटा के मुताबिक, 2018 में देशभर में 50 लाख 74 हजार 634 अपराध दर्ज किए गए थे। ये आंकड़ा 2017 की तुलना में 1.3% ज्यादा था। इसमें भी अकेले उत्तर प्रदेश में इस साल 5 लाख 85 हजार 157 क्राइम रिकॉर्ड हुए थे। इस हिसाब से 2018 में देशभर में जितने भी क्राइम रिकॉर्ड हुए, उसमें से सबसे ज्यादा 11.5% मामले अकेले यूपी में दर्ज हुए थे। 

हिंसक अपराधों में भी यूपी अव्वल : 

वॉयलेंट क्राइम यानी ऐसे अपराध, जिसमें हिंसा हुई है। जैसे- बलात्कार, बलात्कार की कोशिश, हत्या, हत्या की कोशिश, चोरी-डकैती, दंगा या हिंसा भड़काना और वगैरह-वगैरह। ऐसे वॉयलेंट क्राइम में भी यूपी देश में टॉप पर है। सन् 2018 में देशभर में 4 लाख 28 हजार 134 वॉयलेंट क्राइम दर्ज हुए थे। इसमें से 65 हजार 155 मामले अकेले यूपी में दर्ज हुए थे। यानी देश में जितने वॉयलेंट क्राइम रिकॉर्ड हुए, उसमें से 15% यूपी में दर्ज हुए थे। इतना ही नहीं, 2018 में देश में 29 हजार 17 मर्डर हुए थे, इसमें से सबसे ज्यादा 4 हजार 18 हत्याएं यूपी में हुईं। 1 लाख से ज्यादा किडनैपिंग हुई थीं, उसमें से 21 हजार से ज्यादा किडनैपिंग यूपी में हुईं। बलात्कार के मामले में भी मध्य प्रदेश और राजस्थान के बाद यूपी तीसरे नंबर पर था।

दलितों के खिलाफ अपराध : 

अनुसूचित जाति और जनजाति के खिलाफ अपराध के मामले में भी उत्तर प्रदेश टॉप पर है। 2018 में देशभर में दलितों के खिलाफ अपराध के 42 हजार 793 मामले दर्ज किए गए थे। इसमें से तकरीबन 28% मामले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए थे। इस साल यूपी में दलितों के खिलाफ अपराध के 11 हजार 924 मामले रिकॉर्ड हुए थे। 

नाबालिग अपराधियों के मामले में यूपी : 

देशभर में 2018 में 31 हजार 591 नाबालिगों ने अपराध की दुनिया में कदम रखा। इसमें सबसे ज्यादा 5 हजार 880 नाबालिग महाराष्ट्र के थे। दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश था, जहां के 5 हजार 232 नाबालिग थे। जबकि, यूपी इस मामले में 11वें नंबर पर था। यहां के 1 हजार 48 नाबालिग अपराधी बने।

महिलाओं के खिलाफ अपराध में शीर्ष पर : 

2018 में देशभर में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 3 लाख 78 हजार 277 मामले दर्ज किए गए थे। इसमें सबसे ज्यादा 59 हजार 445 मामले अकेले यूपी में दर्ज हुए थे। 2018 में देशभर में महिलाओं के खिलाफ अपराध के जितने मामले दर्ज हुए थे, उसमें से 15.7% मामले यूपी में सामने आए थे। बलात्कार के मामलों में यूपी तीसरे नंबर पर था। 2018 में बलात्कार के सबसे ज्यादा 5 हजार 433 मामले मध्य प्रदेश में और उसके बाद 4 हजार 335 मामले राजस्थान में दर्ज हुए थे। जबकि, यूपी में 3 हजार 946 मामले आए थे। इतना ही नहीं, बलात्कार की कोशिश के मामलों में यूपी पहले नंबर पर था। देशभर में 4 हजार 97 बलात्कार की कोशिश के मामले रिकॉर्ड हुए थे, इसमें से सबसे ज्यादा 661 मामले यूपी में दर्ज हुए थे।

बच्चों के खिलाफ अपराध में यूपी फर्स्ट : 

न सिर्फ महिलाओं के खिलाफ अपराध में बल्कि बच्चों के खिलाफ अपराध में भी उत्तर प्रदेश देश में पहले नंबर पर है। एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2016 से लेकर 2018 तक यूपी देश का पहला राज्य था, जहां सबसे ज्यादा बच्चों के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज किए गए। 2018 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 1 लाख 41 हजार 764 मामले दर्ज हुए थे, उसमें से 14% से ज्यादा अकेले यूपी में हुए थे। इस साल उत्तर प्रदेश में 19 हजार 936 मामले सामने आए थे।

आर्थिक अपराध में भी यूपी टॉप पर : 

लोगों को किसी तरह का लालच देकर उनसे पैसे ऐंठना, किसी दूसरे की प्रॉपर्टी पर कब्जा करना या धोखाधड़ी करना, ऐसे अपराधों को आर्थिक अपराध यानी इकोनॉमिक ऑफेंस कहा जाता है। आर्थिक अपराध के मामले में भी उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है। 2018 में देशभर में 1 लाख 56 हजार 268 मामले आर्थिक अपराध के दर्ज किए गए थे। इसमें से 22 हजार 822 मामले सिर्फ यूपी में ही दर्ज हुए थे। 

साइबर क्राइम में पहले नंबर पर : 

कम्प्यूटर या इंटरनेट के जरिए किए गए क्राइम को साइबर क्राइम माना जाता है। देश में ऐसे अपराधों के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। 2016 में देशभर में 12 हजार 317 मामले साइबर क्राइम के दर्ज हुए थे, जबकि 2018 में 27 हजार 248 मामले। 2018 में साइबर क्राइम के जितने मामले दर्ज हुए थे, उसमें से 23% मामले अकेले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए थे। 2018 में उत्तर प्रदेश में 6 हजार 280 मामले साइबर क्राइम के रिकॉर्ड हुए थे। 

तमिलनाडु के बाद यूपी में सबसे ज्यादा गिरफ्तारी : 

2018 में जितने क्राइम हुए, उनमें 55 लाख 08 हजार 190 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें 52 लाख 35 हजार 104 पुरुष और 2 लाख 73 हजार 86 महिलाओं को गिरफ्तार किया गया। इनमें से सबसे ज्यादा 8 लाख 01 हजार 743 गिरफ्तारियां तमिलनाडु में हुई। उसके बाद 7 लाख 12 हजार 215 लोग उत्तर प्रदेश में गिरफ्तार हुए।

यूपी में 6% से भी कम को मिली सजा : 

एनसीआरबी के डेटा के मुताबिक, 2018 में उत्तर प्रदेश की अदालतों में 4 लाख 27 हजार 175 मामले ट्रायल के लिए भेजे गए थे। इसमें से सिर्फ 24 हजार 215 लोगों को ही सजा मिल सकी। इस हिसाब से जितने मामले ट्रायल के लिए आए, उसमें से सिर्फ 5.6% को ही सजा मिली।  जबकि, 9 हजार 815 लोगों को सबूतों के अभाव में रिहा कर दिया गया और 37 हजार 440 लोग अदालत से बरी हो गए।

सबसे ज्यादा जान यूपी के पुलिसवाले ही गंवाते हैं : 

अपराध और अपराधियों की बात तो हो गई, लेकिन जिस वजह से ये स्टोरी तैयार की गई है, अब उसकी बात भी हो जाए। उत्तर प्रदेश में ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले पुलिस कर्मियों की संख्या भी देश में सबसे ज्यादा है। 2017 में यहां के 93 और 2018 में 70 पुलिस कर्मियों की जान गई थी। 2018 में जिन 70 पुलिस कर्मियों की जान गई, उनमें से 20 की जान किसी अपराधी के घर दबिश करने या किसी तरह की डकैती को रोकने की कोशिश में गई थी। इस साल देशभर में 555 पुलिसकर्मी शहीद हुए थे। इतना ही नहीं 2018 में देशभर में 2 हजार 408 पुलिसकर्मी ड्यूटी के दौरान घायल हुए थे, जिसमें से यूपी के 174 पुलिसकर्मी थे।

See More

Latest Photos