कांग्रेस : गांधी के साथ या गांधी के बाद - पार्टी से फिसलती कांग्रेस की कमान

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बेंगलुरु, (परिवर्तन)।

क्या कांग्रेस पार्टी की पहचान केवल गांधी से है या फिर गांधी का कांग्रेस से जुड़े रहना बेहतर माना जाए। दोनों ही बातें एक दूसरे से जुड़ी हुई है। यानि कांग्रेस के बिना गांधी नहीं और गांधी बिना कांग्रेस नहीं। हालांकि बीते कुछ वर्षों में लगातार कांग्रेस के नेतृत्व पर सवाल उठते रहे हैं। कांग्रेस में गांधी का प्रभाव इतना गहरा है कि पार्टी में आज तक अध्यक्ष पद किसी गैर गांधी को देने के निर्णय पर विचार तक नहीं किया गया। कांग्रेस पार्टी को एक परिवार तक ही जोड़े रखना पार्टी को या तो पतन या फिर मतिभ्रम की ओर ले जा सकता है। हर चीज का एक सही वक्त होता है और गांधी परिवार के साथ भी यही सच है, उन्होंने देश के लिए बहुत कुछ किया है। हालांकि, पार्टी आधुनिक भारत को चलाने के लिए खुद को फिर से स्थापित करने में विफल रही। मनमोहन सिंह के बाद, वे एक ऐसे नेता को नहीं खोज पाए हैं, जो बाजारों में विश्वास जगाए और उन्हें वोट दिलवाए। कई लोगों को पीएम मोदी या उनकी विचारधारा पसंद नहीं है। हालाँकि सच यह भी है कि वे सीट में एक और गांधी को नहीं देखना चाहते हैं। अफसोस की बात है कि कांग्रेस के पुराने लोग इस वास्तविकता का सामना तक नहीं करना चाहते हैं। वे पार्टी का मजाक बना रहे हैं और भारत के लोकतांत्रिक परंपराओं को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

…. चाहिए एक मजबूत विपक्ष

भारत की खातिर, गांधी परिवार को सामाजिक कार्यों जैसे अन्य क्षेत्रों में कदम रखना चाहिए और राजनीति को नेताओं की नई पीढ़ी को सौंप देना चाहिए। किसी भी देश के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है। लोकतंत्र के लिए और अधिक, यह दक्षिणपंथी कट्टरपंथी द्वारा उठाए जाने के कगार पर है। कोई भी एक पार्टी नहीं है जो आज के समय में भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के आमने सामने बैठकर फैसलों पर अपना नजरिया मजबूती से रख सके। बीजेपी को चुनौती और सवाल उठाना है, हालांकि राहुल गांधी की शैली इससे मेल नहीं खाती और न ही उनमें नेतृत्व कौशल है वरना ऐसा नहीं होता कि चुनाव हारने के बाद वे पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा क्यों देते। क्या सोच पर उन्होंने पार्टी के इतने गरिमामय पद का मज़ाक बनाया। क्या सोच पर पार्टी के अन्य नेताओं ने इसका विरोध नहीं किया। क्या सोच कर एक बार फिर से सोनिया गांधी को पार्टी के अध्यक्ष पर पदासीन किया गया। क्या इस फैसले से ये समझा जाए कि कांग्रेस में कोई काबिल नेता नहीं है जो इस पद की गरिमा को संभाल सके या फिर ये समझा जाए कि गांधी परिवार का प्रभाव हमेशा से कांग्रेस पार्टी पर रहा है और आगे भी रहेगा। बुद्धिजीवियों का कहना है कि कांग्रेस के पास नेताओं की कमी नहीं है, परिवार को विकसित होने के लिए भारत से दूर जाना होगा। समय आ गया है कि कांग्रेस खुद की समीक्षा करे और गांधी की गोद से बाहर निकलें। ताकि आने वाले दिनों में कांग्रेस एक मजबूत राष्ट्रीय पार्टी के रूप में ऊभर कर सामने आ सके।

क्या बदलेगी कांग्रेस की दुर्दशा

बुद्धिजीवी एवं लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक लिखते हैं, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने डाॅ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में तीन कमेटियां बना दी हैं, जिनका काम पार्टी की अर्थ, सुरक्षा और विदेश नीतियों का निर्माण करना है। इन कमेटियों में वे कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी भी हैं, जिन्होंने कांग्रेस की दुर्दशा सुधारने के लिए पत्र लिखा था। इस कदम से यह अंदाज तो लगता है कि जिन 23 नेताओं ने सोनिया जी को टेढ़ी चिट्ठी भेजी थी, उनसे वह भयंकर रूप से नाराज़ नहीं हुईं। ये बात और है कि उस चिट्ठी का जवाब उन्होंने उनको अभीतक नहीं भेजा है। उनकी इस कोशिश की तारीफ करनी पड़ेगी कि उन्होंने कोई ऐसे संकेत नहीं उछाले, जिससे पार्टी में टूट-फूट के आसार मजबूत हो जाएं लेकिन यह समझ में नहीं आता कि उक्त तीनों मुद्दों पर पार्टी के बुजुर्ग नेताओं से इतनी कसरत करवाने का उद्देश्य क्या है? मानों उन्होंने कोई दस्तावेज तैयार कर दिया तो भी उसकी कीमत क्या है? पार्टी में क्या किसी नेता की आवाज में इतना दम है कि राष्ट्र उसकी बात पर कान देगा? उसकी बात पर ध्यान देना तो बहुत दूर की बात है। सारा प्रचारतंत्र जानता है कि कांग्रेस का मालिक कौन है? मां, बेटा और अब बेटी।

जो कांग्रेस आज अधमरी हो चुकी है, पहले उसे जिंदा करने की कोशिश होनी चाहिए या देश को बचाने की ? देश बचाने के लिए अभी तो नरेंद्र मोदी ही काफी हैं। यदि कांग्रेस मजबूत होती और संसद में उसके लगभग 200 सदस्य होते तो वह एक वैकल्पिक सरकार बना सकती थी। वैकल्पिक छाया सरकार के नाते उसके सुझाव में थोड़ा दम भी होता लेकिन अब जो पहल हो रही है, वह हवा में लाठी घुमाने-जैसा है। कांग्रेस के सामने अभी उसके अस्तित्व का संकट मुंह फाड़े खड़ा हुआ है और वह वैकल्पिक नीतियां बनाने में लगी रहेगी। इस समय ये तीन कमेटियां बनाने की बजाय उसे सिर्फ एक कमेटी बनानी चाहिए और उसका सिर्फ एक मुद्दा होना चाहिए कि कांग्रेस में कैसे जान फूंकी जाए ? इस समय कांग्रेस का दम घुट रहा है। यदि उसे ताजा नेतृत्व की हवा नहीं मिली तो हमारा लोकतंत्र कोरोनाग्रस्त हो सकता है। सक्षम विपक्ष के बिना कोई भी लोकतंत्र स्वस्थ नहीं रह सकता।

चुनावों के दौरान गांधी परिवार का रवैय्या

राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बहुत छोटे हैं। लेकिन मोदी ने गांधी से ज्यादा रैलियों को संबोधित किया। कांग्रेस ने सीटों के बंटवारे में 70 से अधिक सीटें लीं लेकिन 70 रैलियां तक नहीं कीं। इस बार के चुनावों में जितने सीटों पर चुनाव हुए थे, उनमें पार्टी का प्रयास बिहार में इस समय कम था। जब चुनाव हो रहे थे तब गांधी शिमला में अपनी बहन के घर पर पिकनिक मना रहे थे। क्या यह पार्टी चलाने का तरीका है? राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने कहा कि पार्टी चलाने में कांग्रेस का गैर-गंभीर दृष्टिकोण केवल आरोप लगाने के लिए है कि पार्टी के कुछ नेता भाजपा की मदद कर रही है।

राहुल गांधी ने तीन-चरण के चुनाव के लिए तीन सप्ताह के लंबे चुनाव अभियान में केवल आठ रैलियों को संबोधित किया, जो 7 नवंबर को समाप्त हो गया। मुखर नेता तिवारी ने भी कांग्रेस को गैर-गंभीर पार्टी के रूप में पुकारा। कांग्रेस ने 70 सीटों में से केवल 19 सीटें जीतीं। इसने राजद के नेतृत्व वाले ग्रैंड अलायंस में नाराज़गी पैदा कर दी है।

वरिष्ठ नेता ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को बनाए रखा, परिवर्तन या संगठनात्मक व्यवहार के लिए यहां तक ​​कि वरिष्ठ नेताओं को सुनने के लिए अनुकूल नहीं था। वह इस बात पर प्रकाश डाल रहे थे कि कैसे पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को व्यापक बदलाव लाने के लिए लिखा था। लेकिन क्या हुआ? कुछ भी नहीं। कांग्रेस के कामकाज के तरीके में कोई बदलाव नहीं हुआ। पूर्व राज्यसभा सांसद और पूर्व मंत्री रह चुके तिवारी भी प्रियंका गांधी के खिलाफ अपने हमले के बारे में अनसुना कर रहे थे, उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में उनका ध्यान केंद्रित है क्योंकि एआईसीसी के महासचिव ने राजनीति में ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं देखी है। हाल ही में यूपी में चार सीटों पर हुए उपचुनाव में, कांग्रेस के उम्मीदवारों ने सात सीटों में से चार सीटों पर अपनी जमा पूंजी खो दी थी, जहां चुनाव हुए थे। तो प्रियंका ने यूपी में पार्टी की शिथिलता को दूर करने के लिए क्या किया?

अपनी तीखी आलोचना के बावजूद, तिवारी ने कहा कि कांग्रेस के खिलाफ उनके बयानों को राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में नहीं बल्कि राज्य के एक वरिष्ठ राजनेता के रूप में माना जाना चाहिए। हम चाहते हैं कि कांग्रेस मजबूत हो। आज, लोकतंत्र खतरे में है, खासकर जिस तरह से नागरिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है, और भाजपा शासन के तहत देश में लोकतांत्रिक आवाज़ों को दबाया जा रहा है। लेकिन मुझे लगता है कि इस दिशा में कांग्रेस कोई ठोस प्रयास नहीं कर रही है। एक पार्टी के रूप में, कांग्रेस को भाजपा से सहयोगी के रूप में पुन: निर्वाचित होने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसे शीर्ष पद पर जाने के लिए सीखना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि बिहार कांग्रेस के नेता भी अब स्वीकार कर रहे हैं कि उम्मीदवार के चयन में महत्वपूर्ण गलतियाँ थीं। तिवारी ने कहा, कांग्रेस नेताओं ने धरना दिया। पार्टी नेताओं का एक वर्ग अब यह स्वीकार कर रहा है कि यह गलत चयन और दोषपूर्ण अभियान था, जिसके कारण पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा।

राजद ने अब तक कांग्रेस पर आरोप लगा दिया था कि महागठबंधन की असफलता के लिए विपक्षी दल के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव के साथ आधे रास्ते तक पहुंचने में सभी सहयोगियों ने सामूहिक रूप से काम किया है। लेकिन सीपीआई-एमएल (मुक्ति), राज्य की एक प्रमुख वामपंथी पार्टी जिसने 12 में जीत हासिल की। इस बार महागठबंधन पार्टनर के रूप में सीटें, पहले ही गठबंधन की पराजय के लिए कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर चुकी हैं। सीपीआई-एमएल के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा, कांग्रेस की कम हड़ताल दर थी, और ऐसा प्रतीत होता है कि पार्टी ने अपने उम्मीदवारों का चयन नहीं किया और चुनाव प्रचार अभियान को वांछित बनाया। कांग्रेस को अपनी कमियों की समीक्षा करनी चाहिए।

आजादी के बाद ऐसे बदली कांग्रेस

बिडंबना है कि कांग्रेस के मौजूदा नेताओं द्वारा अब भी यह मुनादी पीटा जाता है कि उसकी कांग्रेस गांधी की ही कांग्रेस है। कांग्रेस के सफर पर नजर दौड़ाएं तो 1947 से लेकर 1964 तक देश की बागडोर पंडित जवाहर लाल नेहरु के हाथ में रहा। निःसंदेह वे एक महान राजनेता थे और उन्होंने देश की प्रगति में अहम योगदान दिया। उन्होंने भारत की आर्थिक समृद्धि के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनायी। सिंचाई के उचित प्रबंध के लिए बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं का शुभारंभ किया। इन योजनाओं को आधुनिक भारत का तीर्थ कहा। रोजगार सृजन और तरक्की के लिए कल-कारखानों की स्थापना की। निर्गुटता और पंचशील जैसे सिद्धांतों का पालन कर विश्व बंधुत्व एवं विश्वशांति को एक सूत्र दिया। मार्शल टिटो और अब्दुल गमाल नासिर के साथ मिलकर एशिया और अफ्रीका मंज उपनिवेशवाद के खात्मे के लिए एक गुटनिरपेक्ष आंदोलन की जमीन तैयार की। इसके अलावा उन्होंने कोरियाई युद्ध का अंत करने, स्वेज नहर विवाद सुलझाने और कांगो समझौते को मूर्तरुप देने जैसे अन्य अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान की दिशा में शानदार पहल की। लेकिन उनसे कुछ भूलें भी हुई जिसका खामियाजा आज देश भुगत रहा है।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने लिखा है कि निःसंदेह बेहतर होता यदि नेहरु को विदेश मंत्री और सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता। तब भारत में कश्मीर, तिब्बत, चीन और अन्यान्य विवादों की कोई समस्या नहीं रहती। 1964 में पंडित नेहरु के निधन के बाद कांग्रेस का शीराजा बिखरने लगा। उसका मूल कारण यह रहा कि जिस कांग्रेस ने देश को जाग्रत किया, समाज में समरसता घोली, बहुधर्मी और बहुविविधतापूर्ण भारतीय समाज के विभिन्न संप्रदायों के बीच समरसता के फूल उगाए उस कांग्रेस ने सत्ता में बने रहने के लिए देश को जाति, धर्म, पंथ और संप्रदायों में बांट दिया। आजादी से पूर्व जिस कांग्रेस के अखिल भारतीय चरित्र में संपूर्ण जाति, धर्म और पंथ का प्रतिनिधित्व समाहित था वह वंशवाद में विलीन होकर रह गया।

कांग्रेस की मजबूरी या मज़बूती

बीबीसी की एक खास रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई इस सवाल पर कहते हैं, किसी भी संगठन में सबकी ज़िम्मेदारी होती है। यह बात सही है कि कांग्रेस में गांधी परिवार की ज़्यादा भूमिका है। ऐतिहासिक रूप से इसका एक आज़ादी के समय का मॉडल रहा है। समस्या यह है कि लोग सवाल तो करते हैं लेकिन कोई पहल नहीं करता है। ऐसे अनेक प्रावधान है कांग्रेस पार्टी के संविधान के अंदर जिसका इस्तेमाल किया जा सकता है। जैसे हस्ताक्षर अभियान चलाना या फिर ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की बैठक बुलाना। अर्जुन सिंह ने नरसिम्हा राव के खिलाफ़ पार्टी के अंदर में एक बार मुहिम छेड़ी थी। उस वक़्त उन्होंने इसी हस्ताक्षर अभियान का इस्तेमाल करके ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन बुलाया था। वो आगे कहते हैं, सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बनीं थी, क्योंकि राहुल गांधी खुला हाथ चाहते हैं जो उन्हें उस तरह से पुराने नेताओं की वजह से नहीं मिल पा रहा है। राहुल गांधी की अध्यक्ष नहीं बनने की अपनी वजहें हैं, लेकिन यह संगठन का दायित्व बनता है कि वो अपना अध्यक्ष खोजे और बनाए। वहीं वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी इस सवाल पर कहती हैं, गांधी परिवार के बिना भी नहीं चलता और उनके साथ भी नहीं चल पा रहा है। कांग्रेस का मामला अभी बुरी तरह से फंसा हुआ है। सोनिया गांधी का फिर से अंतरिम अध्यक्ष बनना तो तय ही था क्योंकि और कोई सामने ही नहीं आ रहा है। वो आगे बताती हैं, दूसरी बात यह कि अगर गांधी परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई आगे बढ़ने की कोशिश करता है तो फिर पार्टी के टूटने का ख़तरा है। ऐसी स्थिति में पार्टी का फिर से उभार नहीं हो पा रहा है। सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष हैं। वो बीमार भी हैं। राहुल गांधी ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं है। वो चाहते हैं कि उन्हें निर्णय लेने के मामले में पूरी छूट मिले। उन्हें लगता है कि वो बन भी जाएँगे तो क्या होगा, जो पुराने नेता हैं वो उन्हें कुछ करने ही नहीं देंगे। प्रियंका गांधी को आगे लाया नहीं जा रहा है, क्योंकि सोनिया चाहती हैं कि राहुल गांधी सामने आए। इसलिए यह एक अजीबोगरीब स्थिति बनी हुई है।

कांग्रेस का वास्तविक संकट क्या है

अब सवाल उठता है कि कांग्रेस का वास्तविक संकट नेतृत्व को लेकर है या फिर उसकी राजनीति पूरी तरह से हाशिए पर चली गई है और भारतीय राजनीति में उसके लिए अब कोई जगह नहीं बची या फिर बहुत कम बची है? नीरजा चौधरी इस सवाल पर कहती हैं, कांग्रेस को आज की तारीख़ में पता ही नहीं कि वो किस बात को लेकर स्टैंड कर रही है। ना उनके पास वैकल्पिक कोई विजन है, ना रणनीति है और ना ही कोई नेतृत्व है। तीनों ही मोर्चे पर कांग्रेस नाकाम है। आज नौजवान कांग्रेस में हताश हो रहा है। सचिन ने बग़ावत की और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो पार्टी ही छोड़ दी। उन्हें लगता है कि नहीं कांग्रेस का फिर से उभार हो सकता है। इस तरह की मायूसी के माहौल में लोग अलग-अलग जगह ढूँढने लगते हैं। अगर पिछले साल राहुल गांधी ने कहा कि गांधी परिवार से किसी को लीडरशीप के लिए नहीं लेना चाहिए तो फिर कुछ समय के लिए छोड़ देना चाहिए। हालाँकि रशीद किदवई की राय इस पर थोड़ी अलग है। वो कहते हैं, कांग्रेस के अंदर गांधी परिवार को छोड़कर जो दूसरे सीनियर लोग हैं, उन लोगों ने उम्मीद छोड़ दी है। वो अगर थोड़ा दमखम दिखाए तो फिर पार्टी अच्छा कर सकती है। गुजरात समेत मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पार्टी ने अच्छी कामयाबी हासिल की थी। गुजरात में लगभग बराबरी का मुकाबला रहा। इनमें से कई राज्यों में सरकार बनी। दिल्ली और झारखंड में बीजेपी की हार भी हुई। इसलिए यह बात नहीं है कि कांग्रेस या फिर विपक्ष बीजेपी को टक्कर नहीं दे सकते या फिर उसका विकल्प नहीं बन सकते। समस्या यह आ रही है कि जो पार्टी के अंदर में दूसरे स्टेकहोल्डर्स हैं, वो अगुवाई करने को तैयार नहीं हैं। 

वो आगे कहते हैं, आर्थिक नीति, विदेश नीति और रक्षा नीति इन सब मामलों पर कांग्रेस की एक समझ है और लंबा अनुभव है। किसी भी राजनीतिक दल के पास इतना लंबा अनुभव नहीं है. बाक़ी तो सब क्षेत्रीय पार्टी हैं। बीजेपी के मोदी काल का क्या विकल्प है कांग्रेस के पास? इस सवाल पर रशीद किदवई का मानना है, राहुल गांधी में उम्मीद नज़र आती है क्योंकि वो वास्तव में नरेंद्र मोदी का एक विकल्प पेश करते हैं। मोदी की हर नीति को राहुल गांधी चुनौती देते नज़र आते हैं। लेकिन उनकी अपेक्षा है कि उन्हें काम करने की छूट मिले और अपने पसंद के आदमी को नियुक्त करने की आज़ादी मिले। कांग्रेस में इसका फ़िलहाल अभाव है। वहाँ अभी भी पुराने नेताओं का दबदबा राहुल गांधी से ज़्यादा है। सोनिया गांधी के रहते ये नेता अपनी मनमानी करते हैं। अब देखिए राहुल गांधी चाहते थे कि सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री बना दिया जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उसकी वजह से अब पार्टी में राजस्थान और मध्य प्रदेश में खींचतान हुई।


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