लोकतंत्र के मंदिर पर हमला

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

पिछले कई महीनों में यूं तो हजारों घटनाओं ने सूर्खियां बटोरी लेकिन विश्व स्तर पर सबसे ज्यादा चर्चा में कोविड - 19 महामारी के बाद अगर कोई घटना रही तो वो है अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका को दुनिया भर में श्रेष्ठ लोकतंत्र माना जाता रहा है, लेकिन बीते दिनों संसद में हुए हमले के बाद इस सफल लोकतंत्र में अराजकता फैलता नज़र आ रहा है। राष्ट्रपति चुनाव में स्पष्ट जनमत मिलने के बावजूद निवर्तमान राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप किसी न किसी प्रकार से सत्ता हस्तांतरण में अड़चने डाल रहे हैं। यह बात उस वक्त स्पष्ट हुई जब चुनाव के बाद लगभग 60 से अधिक दिन बीच जाने के बाद ट्रंप के समर्थकों ने अमेरिकी संसद पर हमला बोल दिया। इस घटना को अमेरिकी राजनीतिक इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में जोड़ा जाएगा। क्योंकि इस घटना को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है जहां इस प्रकार की घटना होना देश और दुनिया दोनों के लिए शर्मसार कर देने वाली घटना है। 

इस घटना के बाद डोनल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति पद से हटाए जाने की मांग उठ रही है और इतना ही नहीं बल्कि उनके खिलाफ महावियोग प्रस्ताव भी पेश किए गए हैं। वैसे भी रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप का कार्यकाल अब कुछ ही दिन का बचा है। आगामी 20 जनवरी को डेमोक्रेट जो बाइडन राष्ट्रपति के तौर पर उनकी जगह ले लेंगे। हालाँकि उनको हटाने में अब बहुत देर हो गई है, क्योंकि उनका कार्यकाल ख़त्म होने ही वाला है। ऐसे में डेमोक्रेट्स चाहेंगे कि उन पर प्रतिबंध लगाया जाए, जिसमें एक पूर्व राष्ट्रपति के तौर पर उन्हें मिलने वाली सुविधाओं और भविष्य में कोई पद मिलने की संभावना को रोकने जैसे प्रतिबंध शामिल हों।

नस्लीय विभाजन के लिए डोनल्ड ट्रंप पर पहले से ही कई आरोप लगते आए हैं। कहीं न कहीं इस लिए भी अमेरिका का एक बड़ा समुदाय ट्रंप का समर्थन भी करता है। ट्रंप के समर्थक उनके समर्थन में इसीलिए उतरे क्योंकि उन्होंने मतगणना में वृहद पैमाने पर धांधली के आरोप लगाए हैं। केवल इतना ही नहीं उन्होंने अदालत में इसके खिलाफ कई मामले भी दर्ज कराए। कई बार ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म के जरिए भी लोगों को भड़काने का कार्य किया। इसी का नतीजा है कि मंदिर समान संसद भवन पर ऐसा हमला हुआ। इतना ही नहीं डोनल्ड ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को भी हमेशा के लिए बंद करना पड़ा। किसी देश के राष्ट्रपति अपने पद पर बने रहने के लिए अगर इस प्रकार की कोई हरकत करते हैं तो यह कहां तक उचित है। ये हमला भले ही संसद पर हुआ हो लेकिन इससे आहत देश का लोकतंत्र हुआ है और इसे आने वाले कई वर्षों तक याद रखा जाएगा। 

याद करें, एंग्लो-अमेरिकी युद्ध के दौरान ब्रितानी सैनिकों द्वारा किया गया हमला, शायद इस इमारत पर सबसे चर्चित हमला रहा है। वाइस एडमिरल सर एलेक्ज़ांडर कॉकबर्न और मेजर जनरल रॉबर्ट रॉस के नेतृत्व में ब्रितानी सैनिकों ने कैपिटल बिल्डिंग को आग के हवाले कर दिया था। वॉशिंगटन शहर पर यह हमला अगस्त 1814 में हुआ था। तब यह इमारत बन ही रही थी। ब्रितानी सैनिकों ने यह हमला कनाडा के यॉर्क शहर में अमेरिकी सैनिकों द्वारा की गई आगज़नी के जवाब में किया था। कनाडा का यह इलाक़ा उस दौर में ब्रिटेन का उपनिवेश हुआ करता था। ब्रितानी सैनिकों ने इस हमले में ना सिर्फ़ ऐतिहासिक कैपिटल बिल्डिंग, बल्कि व्हाइट हाउस को भी आग लगा दी थी। अमेरिका के इतिहास में यह एकमात्र हमला था, जब वॉशिंगटन शहर पर किसी विदेशी ताक़त ने क़ब्ज़ा कर लिया था। साल 2014 में, उस हमले के 200 साल बाद वॉशिंगटन स्थित ब्रितानी दूतावास ने कैपिटल हमले के लिए आधिकारिक तौर पर माफ़ी माँगी थी। इन दोनों हमलों में एक समानता थी कि दोनों ही हमले एक नेता के आदेश पर हुए। 1814 में हमला ब्रिटेन के राजा के आदेश पर हुआ था और इस बार हमला डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर हुआ।

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