पश्चिम बंगाल चुनावी रण : बीजेपी की हिंदू वोट बैंक में सेंध लगाने को शिवसेना तैयार !

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बेंगलूरु, (परिवर्तन)।

देश के कुछेक राज्य ऐसे हैं जहां अक्सर विधानसभा चुनाव आयोजन सुर्खियों में होता है, जिनमें से पश्चिम बंगाल एक है। पिछले कई दशकों से पश्चिम बंगाल की राजनीति में अलग अलग पहलु लोगों को देखने मिले। विभिन्न राजनीतिक समीकरणों के बीच कई वर्षों तक वामपंथी नेताओं ने पश्चिम बंगाल पर शासन किया। इसके बाद क्षेत्रीय पार्टी के रूप में उभरी तृणमूल कांग्रेस, जिन्होंने मां, माटी व मानूष की अवधारणा को लेकर पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक नया परिदृश्य दिया। अब प्रदेश की राजनीति में प्रवेश की तैयारी न केवल राष्ट्रीय दल कर रहे हैं बल्कि विभिन्न राज्यों के क्षेत्रीय दल भी इस पर जमकर दिलचस्पी ले रहे हैं।  

पश्चिम बंगाल में इस साल होने वाला विधानसभा चुनाव लगातार एक नया मोड़ ले रहा है। राज्य में बीते दस साल से राज कर रही ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार को एक ओर जहां बीजेपी से कड़ी चुनौती मिलने के आसार नजर आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने भी मैदान में उतरने का एलान कर दिया है। कभी बीजेपी की सहयोगी रही शिवसेना ने भी सौ से ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर सबको चौंका दिया है।

बंगाल में शिवसेना के ज़मीनी आधार और उसके चुनावी इतिहास को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए ही उसने मैदान में उतरने का फ़ैसला किया है? कम से कम राजनीतिक पर्यवेक्षकों और बंगाल बीजेपी के नेता तो यही मानते हैं कि शिवसेना के मैदान में उतरने के पीछे मुख्यमंत्री और टीएमसी अध्यक्ष ममता बनर्जी तथा राजनीतिक रणनीतिकार शरद पवार का हाथ भी बताया जा रहा है। लेकिन शिवसेना के प्रवक्ता का दावा है कि वह बांग्ला भाषा, संस्कृति और अस्मिता की रक्षा के लिए चुनाव लड़ेगी। कोलकाता स्थित शिवसेना के प्रदेश मुख्यालय में फि़लहाल कोई वरिष्ठ नेता मौजूद नहीं है। लेकिन आने वाले समय में बंगाल की राजनीति में कई नए समीकरण दिखने की संभावनाएं हैं। 

शिवसेना कितनी सीटों पर लड़ेगी चुनाव?

बंगाल प्रदेश अध्यक्ष शांति दत्त ने शिवसेना के शीर्ष नेतृत्व के साथ चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने के लिए मुंबई स्थिति शिवसेना मुख्यालय के साथ निरंतर रणनीति पर चर्चा तथा गहन चिन्तन कर रहे हैं। दत्त ने कहा कि शीर्ष नेतृत्व के साथ बैठक में कम से कम सौ सीटों पर उम्मीदवार उतारने का फ़ैसला किया गया है। हमने चुनावी तैयारियाँ शुरू कर दी हैं तथा हमें और शीर्ष नेतृत्व को बंगाल में पूर्ण सफलता की उम्मीद है। पार्टी के प्रदेश महासचिव अशोक सरकार उत्तर बंगाल के विभिन्न जिलों के दौरे पर हैं। उन्होंने बताया कि शिवसेना ने वर्ष 2016 के विधानसभा और वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी उम्मीदवार उतारे थे। दोनों बार बिना किसी खास प्रचार के हमारे उम्मीदवारों को हर सीट पर चार से साढ़े चार हज़ार तक वोट मिले थे। इस बार हमें कामयाबी मिलना तय है।

सरकार का कहना है कि शिवसेना बांग्ला भाषा, संस्कृति और अस्मिता की रक्षा के लिए चुनाव मैदान में उतर रही है। हम बंगाल में बढिय़ा काम करना चाहते हैं और अपना आधार मज़बूत करना चाहते हैं। हमारा मक़सद यह साबित करना है कि लोकतंत्र में छोटे दल भी किसी राज्य से चुनाव लड़ सकते हैं। शिवसेना ने वर्ष 2016 के विधानसभा में मालदा के अलावा उत्तर और दक्षिण 24-परगना, नदियाँ, मुर्शिदाबाद, मेदिनीपुर और अलीपुरदुआर समेत कई जि़लों की 22 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसी तरह बीते लोकसभा चुनावों में भी पार्टी ने 15 सीटों पर चुनाव लड़ा था। लेकिन वह अपनी ख़ास छाप नहीं छोड़ सकी थी।

बीजेपी को कितना पड़ेगा फक़ऱ्?

बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने यह आरोप लगाया है कि बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए ही शिवसेना इस बार मैदान में उतर रही है। इस पर शिवसेना के प्रदेश महासचिव अशोक सरकार का कहना है कि यह आरोप निराधार है। उलटे बीजेपी हमारे वोट काटने के लिए करोड़ों रुपए ख़र्च कर रही है। केंद्र की बीजेपी सरकार डरी हुई है। वह महज़ चंद उद्योगपतियों के हित साध रही है, आम लोगों के नहीं। इंदिरा गांधी ने तो कह कर आपातकाल लागू किया था लेकिन मोदी सरकार बिना कहे आपातकाल लागू कर रही है।

किसान आंदोलन का जि़क्र करते हुए वो कहते हैं कि पचास से ज़्यादा किसानों की मौत के बावजूद प्रधानमंत्री या पार्टी के दूसरे नेताओं के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है। शिवसेना नेता का दावा है कि अगले कुछ दिनों में बीजेपी के 12 हज़ार से ज़्यादा समर्थक शिवसेना में शामिल हो जाएँगे।

शिवसेना नेताओं का दावा है कि राज्य में उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे, अनिल देसाई और संजय राउत पार्टी के स्टार प्रचारक होंगे। सरकार कहते हैं कि टीएमसी के साथ पार्टी किसी तरह का तालमेल नहीं करेगी। वो कहते हैं, हम बांग्ला भाषा, संस्कृति और हिंदू अस्मिता को बचाने के लिए लोगों से वोट माँगेंगे।

टीएमसी के साथ गठजोड़ के आरोप

बीजेपी का दावा है कि यहाँ शिवसेना का कोई आधार नहीं है। पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष जय प्रकाश मजुमदार कहते हैं, बंगाल में शिवसेना का कोई आधार नहीं है। वह बीजेपी के खिलाफ टीएमसी की मदद के लिए ही मैदान में उतर रही है। लेकिन इससे हमारी पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर कोई असर नहीं होगा।

उधर, टीएमसी के वरिष्ठ नेता तापस राय कहते हैं, बीजेपी शिवसेना के चुनाव मैदान में उतरने की कैसी व्याख्या करती है, यह उसका निजी मामला है। लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक दल किसी भी राज्य में चुनाव लड़ सकता है। हम किसी को ऐसा करने से रोक नहीं सकते। लेकिन राजनीति पर्यवेक्षकों का कहना है कि शिवसेना के मैदान में उतरने से साफ़ है कि उसकी निगाहें बीजेपी के वोट बैंक पर हैं।

शिवेसना तथा औवेसी की भूमिका

राजनीतिक विश्लेषक समीरन पाल कहते हैं, शिवसेना का मैदान में उतरना ममता बनर्जी के लिए अच्छी ख़बर है। पश्चिम बंगाल में ऐसा चुनावी राजनीति पहले देखने को नहीं मिली है जब कोई पार्टी ख़ुद जीतने के बजाय किसी दूसरे दल की मदद के लिए मैदान में उतर रही हो। शिवसेना पहले कभी बंगाल में नहीं जीती है और इस बार भी इसकी संभावना कम ही है। यह बीजेपी के खिलाफ उसी भूमिका में रहेगी जैसे टीएमसी के खिलाफ असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी। उनका कहना है कि शिवसेना को मिलने वाला एक-एक वोट बीजेपी के वोट बैंक में सेंध की तरह होगा।

एक अन्य पर्यवेक्षक निर्माल्य बनर्जी कहते हैं, शिवसेना बांग्ला राष्ट्रवाद की भावना को उकसाने का प्रयास कर रही है। टीएमसी और ममता बनर्जी का मुद्दा भी यही है। सेना इस मुद्दे के ज़रिए बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास करेगी। बनर्जी भी कहते हैं कि जिस तरह ओवैसी ममता के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध के इरादे से मैदान में उतर रहे हैं। बीजेपी के हिंदू वोट बैंक में शिव सेना भी इसी तरह सेंध लगाने का काम करेगी।

प्रशांत किशोर का एलान

पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बयानों का पारा चढ़ने लगा है। शुभेंदु अधिकारी समेत टीएमसी के कई नेताओं के अमित शाह के दौरे के दौरान बीजेपी में शामिल होने के बाद चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने दावा किया है कि बंगाल में भाजपा दहाई के आंकड़े के लिए भी संघर्ष करती दिखेगी। इतना ही नहीं, उन्होंने ऐलान किया है कि अगर भाजपा दहाई का आंकड़ा पार करती है तो वह चुनावी रणनीतिकार का काम छोड़ देंगे। गौरतलब है कि पिछले लोकसभा चुनाव में बंगाल में बीजेपी के 18 सीटों पर जीत दर्ज करने के बाद ममता बनर्जी ने प्रशांत किशोर की कंपनी आई-पेक को हायर किया। बीजेपी में शामिल होने वाले तृणमूल कांग्रेस के ज्यादातर नेताओं ने प्रशांत किशोर की कार्यशैली की आोलचना की है। प्रशांत किशोर का दावा इस लिहाज से महत्वपूर्ण है क्योंकि अमित शाह पहले ही कह चुके हैं कि उनकी पार्टी बंगाल विधानसभा के अगले चुनाव में 200 से ज्यादा सीटें लाकर सरकार बनाएगी।

दूसरी तरफ, बीजेपी ने प्रशांत किशोर को भाड़े का सिपाही बताते हुए उनके ट्वीट पर चुटकी लेते हुए कहा है कि वह अपने एम्पलॉयर (ममता बनर्जी) को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं। बंगाल बीजेपी के उपाध्यक्ष जय प्रकाश मजूमदार ने कहा कि प्रशांत किशोर को तृणमूल कांग्रेस की नैया पार लगाने के लिए काफी अच्छी कीमत मिली है और ऐसे में अपनी क्षमता पर उठ रहे सवालों को दबाने के लिए प्रशांत किशोर ने यह ट्वीट किया है।

आई-पेक के एक अधिकारी ने कहा कि एकदम स्पष्ट हैं कि प्रशांत किशोर कह रहे हैं कि बीजेपी 99 से अधिक सीटें बंगाल में जीत जाती है तो चुनावी रणनीतिकार का काम छोड़ देंगे। इस अधिकारी ने कहा कि बीजेपी के जो लोग प्रशांत किशोर पर सवाल उठा रहे हैं क्या वे 99 से कम सीटें जीतने पर राजनीति छोड़ेंगे?

आमतौर पर प्रशांत किशोर अपनी कंपनी और अपने काम को लेकर मीडिया में बात नहीं करते हैं। तृणमूल कांग्रेस के बागी नेताओं के अलावा भाजपा नेता भी बंगाल में लगातार प्रशांत किशोर पर सवाल उठा रहे हैं। जब टीएमसी की ओर से भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं को बाहरी कहकर हमला किया गया तो जवाब में बीजेपी ने कहा कि ममता बनर्जी को चुनाव जीतने के लिए बिहार के एक आदमी से मदद लेनी पड़ रही है। माना जा रहा है कि अपने ऊपर लगातार हो रहे हमले की वजह से प्रशांत किशोर ने ऐसा आक्रामक ट्वीट किया है। बता दें कि ममता बनर्जी के खास माने जाने वाले शुभेंदु अधिकारी के टीएमसी से अलग होने की कई वजहों में एक वजह प्रशांत किशोर भी माने जाते हैं। सूत्र ने कहा कि शुभेंदु अधिकारी ममता बनर्जी के भतीते अभिषेक और प्रशांत किशोर से काफी समय से नाराज़ चल रहे थे।

क्यों पिछड़ता जा रहा बंगाल

लेखक आरके सिन्हा कहते हैं, कोलकाता में एक तरह का डर और बेचैनी का माहौल है। आप किसी चाय की दुकान में खड़े होकर पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव के बारे में किसी स्थानीय बंगबंधु से पूछिए। वह आशंका जताएगा कि चुनाव के पहले राज्य में भारी हिंसा हो सकती है। भय और आतंक का माहौल बनाया जा सकता है। कोलकाता से आपको सारे प्रदेश की मन:स्थिति का अंदाजा लग जाता है। जब देश नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती मना रहा है तब यह स्थिति निश्चित रूप से उदास करने वाली है। पश्चिम बंगाल में मई तक विधानसभा चुनाव संपन्न हो जाएंगे। वहां मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल जल्दी ही समाप्त हो रहा है।

देखा जाए तो ममता बनर्जी के दस वर्षों के कार्यकाल के दौरान देश का एक शानदार राज्य पिछड़ता ही रहा। वहां बार-बार हिंसा होती रही। पश्चिम बंगाल में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का नारा लगाने वालों को गिरफ्तार किया जाता रहा। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस पार्टी (टीएमसी) 2011 में पहली बार सत्ता में आई तो आशा जागी थी कि राज्य में वाम मोर्चा की सरकार के 35 साल पुराने कुशासन के अंत के साथ राज्य में विकास का पहिया चलने लगेगा। पर यह नहीं हुआ। वहां भारी पैमाने पर अराजकता और अव्यवस्था व्याप्त होने लगी। अब ममता बनर्जी के लिए राज्य में भाजपा के बढ़ते कदम खतरे की घंटी के समान है। उनके हाथ-पैर फूल चुके हैं। उन्हें अब समझ आ गया है कि 2021 का विधानसभा चुनाव टीएमसी के लिए ताबूत में आखिरी कील साबित होंगे।

याद करें कि ममता बनर्जी कुछ समय पहले तक देश की प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रही थीं। ताजा स्थिति यह है कि वे अब अपने ही राज्य में बुरी तरह नापसंद की जा रही हैं। इसका उदाहरण हमने बीते 2019 के लोकसभा चुनाव में देखा। वहां लोकसभा चुनाव के दौरान कसकर तृणमूल प्रायोजित हिंसा हुई फिर भी नतीजे भाजपा के पक्ष में रहे थे। भाजपा ने टीएमसी की गर्दन में अंगूठा डाल दिया था। राज्य की कुल 42 में से 18 सीटें भाजपा को मिलीं। जबकि भाजपा को 2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में मात्र 2 सीटें ही मिलीं थी। यह बदलाव इसलिए हुआ क्योंकि राज्य की जनता ममता बनर्जी के कामकाज से हताश हो चुकी है। वहां विकास थम चुका है। दुखद यह है कि ममता दीदी सिर्फ मुसलमानों के तुष्टिकरण में ही लगी रहीं। ममता दीदी को लगता था कि वे प्रधानमंत्री मोदी जी और भाजपा को बुरा-भला कहकर ही प्रधानमंत्री भी बन ही जाएंगी।

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